Thursday, April 23, 2026
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शनिदेव की महिमा – शनि जयंती 2026, शनि मंत्र, शनि दोष उपाय, शनि कथा

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शनिदेव की महिमा
शनिदेव की महिमा

प्रिय भक्तों, क्या आप को  ज्ञात है कि ”शनि देव ” कौन है?  नहीं ना! तो आज हमलोग जानेंगे शनिदेव के विषय में कुछ ज्ञानवर्धक  बातें।

शनिदेव को सूर्यदेव का पुत्र और न्याय का देवता माना जाता है। वो कर्मफल दाता हैं, और अपने कर्मों के अनुसार लोगों को न्याय प्रदान करते हैं।

शनिदेव का स्थान नौ ग्रहों में सातवां  माना जाता है। शनिदेव की चाल धीमी है। न्याय के देवता शनिदेव को मिथ्या वचन बोलने वाले,अलसी लोग अथवा किसी जीव को हानि पहुंचाने वाले लोग पसंद नहीं हैं। जो लोग अच्छे कर्म करते हैं, दयालु होते हैं और शनिदेव की आराधना एवं पूजा करते हैं, उनसे शनिदेव प्रसन्न होते हैं और उन्हें शुभ फल प्रदान करते है। यदि शनिदेव किसी व्यक्ति पर क्रोधित हो जाते हैं, तो उनका जीवन कठिनाइयों से भर जाता है। शनिदेव के कोप के कारण  व्यक्ति को नरक के सामान दुःख भोगना पड़ता हैं। शनिदेव को  पितृ शत्रु भी बताया जाता है।  शनिदेव के विषय में अनेकानेक प्रकार की  भ्रान्तियाँ  हैं , इस लिये शनिदेव को मारक, अशुभ और दुख कारक माना जाता है।

शनि देव के बहुत से नाम हैं, धर्म ग्रंथों  में शनि देव के 108 नाम बताए गए हैं, लेकिन शनि देव के 10 नाम अत्यधिक प्रसिद्ध हैं।

शनिदेव के दस प्रसिद्ध नाम:

  1. कोणस्थ
  2. पिंगल
  3. बभ्रु
  4. कृष्ण
  5. रौद्रान्तक
  6. यम
  7. सौरि
  8. शनैश्चर
  9. मंद
  10. पिप्पलाद

ज्योतिष के अनुसार, शनिदेव का शरीर में नाभि और हड्डियों पर आधिपत्य होता है. शनि का असर इन अंगों पर भी पड़ता है (घुटने,पैर, स्नायु तंत्र, कफ, ऐड़ी, आंखें, कनपटी, भवें, नाखून, जोड़ों का पीड़ा इत्यादि)

शनिदेव, मकर और कुंभ राशि के स्वामी है। शनिदेव को ज्योतिष का सबसे बड़ा ग्रह माना जाता है। शनि दोष होने पर व्यक्ति को शारीरिक, आर्थिक, मानसिक और अन्य तरह की समस्याएं हो सकतीं  हैं। शनि दोष के कारण नाभि रोग हो सकता है। शनि दोष के कारण हड्डी टूटने का डर रहता है। शनि की साढ़े साती के दौरान व्यक्ति की निर्णय लेने की क्षमता कमज़ोर हो जाती है। 

Shani Jayanti 2026:

शनि जयंती 2026 की तिथि और समय:

  • तिथि: शनिवार, 16 मई 2026
  • अमावस्या तिथि प्रारंभ: 16 मई 2026 को सुबह 5:10 बजे
  • अमावस्या तिथि समाप्त: 17 मई 2026 को सुबह 1:29 बजे

पूजा विधि:

  1. प्रातःकाल स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र पहनें।
  2. पूजा स्थल पर एक लकड़ी के पट पर काला कपड़ा बिछाकर शनि देव की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
  3. दीपक और धूप जलाकर शनि देव का पूजन करें।
  4. पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद और शक्कर) से स्नान कराएं और उन्हें काले तिल, नीले या काले फूल अर्पित करें।
  5. ॐ शं शनैश्चराय नमः” मंत्र का 108 बार जाप करें और शनि चालीसा तथा शनि आरती का पाठ करें।
  6. पूजा के बाद शनि देव से अपने पापों की क्षमा मांगें और उनके आशीर्वाद से जीवन में समृद्धि और शांति की प्रार्थना करें।

शनि जयंती के उपाय:

  1. पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाएं।
  2. काले तिल, काले कपड़े, लोहे की वस्तुएं और छाता दान करें।
  3. काले कुत्ते को सरसों के तेल लगी रोटी खिलाएं।
  4. शिवलिंग पर काले तिल से अभिषेक करें।
  5. हनुमान चालीसा का पाठ करें।

इस वर्ष शनि जयंती विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह मंगलवार को पड़ रही है, जो ज्येष्ठ माह की अमावस्या के साथ मेल खाती है। इस विशेष संयोग के कारण शनि जयंती का महत्व और भी बढ़ जाता है।

शनिदेव के विषय में ज्योतषीय विचार:

जातक की कुंडली में शनि दोष होने पर समय से पहले ही व्यक्ति के बाल झड़ने लगते हैं, आखें खराब होने लगतीं हैं, कान में दर्द रहता है। शनि खराब होने से शारीरिक कमजोरी, पेट दर्द, टीबी, कैंसर, चर्म रोग, फ्रैक्चर, पैरालाइसिस, सर्दी-जुकाम, अस्थमा आदि जैसे रोग हो जाते हैं। यदि किसी का शनि खराब है तो उसे मेहनत का फल नहीं मिलता है।

कुंडली में कमजोर शनि के लक्षण:

कुंडली में शनि अशुभ स्थान पर बैठे हों तो शनि दोष उत्पन्न होता है,जिसके कारण कारण व्यक्ति के जीवन में कई समस्याएं आने लगती हैं। शनि दोष होने पर कई लक्षण दिखने लगते हैं, उन संकेतों को जानकर आप शनि दोष का निवारण कर सकते हैं।

शनि दोष के लक्षण:

यदि कुंडली में शनि दोष है तो व्यक्ति के धन और संपत्ति धीरे-धीरे अनावश्यक कार्यों में खर्च होने लगती है।
शनि दोष होने पर वाद-विवाद की स्थिति बनती है, व्यक्ति पर झूठे आरोप लगते हैं। इसके अलावा कोर्ट केस के मामले बनते हैं।
शराब, जुआ और अन्य गंदी आदतें भी शनि दोष का कारण बनती हैं। बनते हुए काम में अड़चने आना, कर्ज का बोझ होना, घर में आग लगना, मकान बिकना या उसका कोई हिस्सा गिरना आदि भी शनि दोष के लक्षण माने गए हैं।

शनि ग्रह को मजबूत करने के उपाय:

ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार शनि अमावस्या पर पीपल की जड़ में कच्चा दूध मिश्रित मीठा जल चढ़ाने, तिल या सरसों के तेल का दीपक जलाने से अनेक प्रकार के कष्टों का निवारण होता है। शनि की साढ़ेसाती या ढैय्या के चलते पीपल के पेड़ की पूजा करना और उसकी परिक्रमा करने से शनि की पीड़ा से मुक्ति मिलती है। वहीं सुख-शांति में वृद्धि के लिए इस दिन पीपल का वृक्ष रोपना बहुत अच्छा माना गया है।
हर शनिवार के दिन एक लोहे के कटोरे में साबुत उड़द, काले चने और सरसों का तेल मिलाकर एक साथ डाल दें। अब इसे काले कपड़े में लपेटकर अपने माथे से लगाकर इसे दान देना शुरू करें, इससे शनि दोष कम होता है।
शनिवार के दिन शनिदेव के दिव्य मंत्र ‘ऊं प्रां प्रीं प्रौं स: शनैश्चराय नम:’ का इस दिन जप करने से प्राणी भयमुक्त रहता है।

शनिदेव के आराध्य भगवान शिव हैं। शनि दोष की शांति के लिए शनिवार के दिन शनिदेव की पूजा के साथ-साथ शिवजी पर काले तिल मिले हुए जल से ‘ॐ नमः शिवाय’ का उच्चारण करते हुए अभिषेक करना चाहिए और ‘ शिवाष्टकम ‘ का पाठ करना चाहिए अथवा श्रवण करना चाहिए

शनिदेव की प्रसन्नता के लिए जातक को शनिवार के दिन व्रत रखना चाहिए एवं गरीब लोगों की मदद करनी चाहिए,ऐसा करने से जीवन में आए संकट दूर होने लगते हैं।

शनिदेव, हनुमानजी की पूजा करने वालों से सदैव प्रसन्न रहते हैं,इसलिए इनकी कृपा पाने के लिए शनि पूजा के साथ-साथ हनुमान जी की भी उपासना करनी चाहिए, शनिदोष से मुक्ति के लिए प्रतिदिन हनुमान चालीसा के सात पाठ का श्रवण करना चाहिए। मंगलवार अथवा शनिवार के दिन ”सुंदरकांड ” का पाठ करने से अथवा श्रवण करने से शनिदेव की कुद्रिष्टि से बचा जा सकता है।

शनि की साढ़ेसाती:

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार , किसी व्यक्ति के जीवन में शनि की साढ़ेसाती तीन बार आती है. शनि की साढ़ेसाती हर 30 साल में आती है. शनि की साढ़ेसाती का हर चरण ढाई साल का होता है।

  • पहला चरण – साढ़ेसाती की शुरुआत, जब शनि जन्म राशि से पहले वाली राशि में होता है |
  • दूसरा चरण – साढ़ेसाती का चरम काल, जब शनि किसी की राशि में होता है |
  • तीसरा चरण – साढ़ेसाती का आखिरी चरण, जब शनि जन्म राशि से निकलकर अगली राशि में पहुंच जाता है।

शनि देव की प्रिय राशियाँ मकर, कुंभ और तुला हैं, मकर और कुंभ राशि शनि की अपनी राशि है, और तुला राशि शनि की उच्च राशि मानी जाती है। मकर और कुम्भ राशि के स्वामी स्वयं शनिदेव हैं, इसलिए इन जातकों पर शनिदेव की विशेष कृपा रहती है। तुला राशि को शनि की उच्च राशि माना जाता है, इसलिए तुला राशि के जातकों पर शनिदेव की कृपा सर्वदा बरसती रहती है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार शनि को कृष्ण का अवतार माना जाता है, जहां कृष्ण कहते हैं कि वह “ग्रहों में शनि” हैं।

साढ़ेसाती और ढैय्या में कर्मों के अनुसार फल मिलता है, लेकिन कुंडली में शनि अशुभ स्थान पर बैठे हों तो शनि दोष उत्पन्न होता है. कुंडली के 3, 7 या 10 वें घर में शनि विराजमान हों तो शनि दोष के कारण व्यक्ति के जीवन में कई समस्याएं आने लगती हैं. कई बार ऐसा होता है कि लोगों को शनि दोष लग जाता है और उन्हें पता भी नहीं होत।

शनि दोष से बचने का सरल उपाय:

  1. यदि कुंडली में शनि दोष है या शनि कमजोर है तो शनि का शुभ रत्न नीलम या उपरत्न काला अकीक, लाजवर्त या जमुनिया नीली में कोइ एक धारण कर सकते हैं. इसे शनिवार के दिन अभिमंत्रित करके पहना जाता है.
  2. शनि दोष निवारण या शनि को मजबूत करने के लिए शनिवार को काले रंग के घोड़े की नाल से बनी अंगूठी को दाएं हाथ की मध्यमा अंगुली में पहनना चाहिए, इससे अभिमंत्रित करके पहनने से लाभ होता है.
  3. शनिवार का व्रत विधिपूर्वक रखकर व्रत कथा का श्रवण करें. शनि देव की पूजा करें. ब्रह्मचर्य के नियमों का पालन करें. मांस, मदिरा का त्याग कर दें. ऐसा करने से कुंडली से शनि दोष दूर हो जाता हैं.
  4. शनि दोष से मुक्ति के लिए शनिवार को शनि मंदिर के बाहर जूते या चप्पल और वस्त्र को छोड़ देते हैं, इसके अलावा आप गरीबों को काला कंबल, छाता, काला या नीले वस्त्र, लोहा, काला तिल आदि का दान कर सकते हैं.
  5. शनि दोष को दूर करने के लिए शनिवार को शुभ मुहूर्त में प्राण प्रतिष्ठित किए गए शनि यंत्र को भी पहन सकते हैं.

शनि दोष से बचने का मंत्र और इसका महत्व:

अगर आपके जन्म कुंडली में शनि दोष हैं तो आप इससे बचने के लिए इस मंत्र का जाप कर सकते हैं, ऐसा करने से न केवल आपके कुंडली से शनि दोष समाप्त हो जाएगी, बल्कि इसके साथ ही शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या से भी आपको मुक्ति मिलेगी.

ॐ निलान्जन समाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम।
छायामार्तंड संभूतं तं नमामि शनैश्चरम॥


पौराणिक कथाओं के अनुसार, शनि देव का जन्म सूर्य देव और उनकी पत्नी छाया के पुत्र के रूप में हुआ था।
शनिदेव की माता छाया ने भगवान शंकर की कठोर तपस्या की थी, जिससे गर्भ में शनि का रंग काला हो गया था।
हालांकि, इस तपस्या ने शनि को अद्भुत और अपार शक्ति प्रदान की थी।

कुछ कथाओं में शनि को कश्यप ऋषि के वंशज बताया गया है, जबकि कुछ में सूर्यदेव और छाया के पुत्र के रूप में।
शनि को न्याय का देवता और कर्मों के फल देने वाला माना जाता है। वे कौए पर सवारी करते हैं और उनकी पत्नी का नाम चित्ररथ है।
शनिदेव को श्री कृष्ण का भक्त भी माना जाता है।

कुछ प्राचीन कथाएं:

शनि देव ने भगवान शिव से वर मांगा था, ‘मुझे सूर्य से अधिक शक्तिशाली व पूज्य होने का वरदान दें. इसपर शिव जी ने कहा कि तुम नौ ग्रहों में श्रेष्ठ स्थान पाने के साथ ही सर्वोच्च न्यायाधीश व दंडाधिकारी रहोगे. साधारण मानव तो क्या देवता, असुर, सिद्ध, विद्याधर, गंधर्व व नाग सभी तुम्हारे नाम से भयभीत होंगे.’ मान्यता के अनुसार, शनिवार के दिन शनि देव शनिदेव को तेल, तिल और कुछ द्रव्य चढ़ाने से उनकी कृपा प्राप्त होती है।

एक बार जब भगवान सूर्य पत्नी छाया से मिलने गए तब शनि ने उनके तेज के कारण अपने नेत्र बंद कर लिए. सूर्य ने अपनी दिव्य दृष्टि से इसे देखा व पाया कि उनका पुत्र तो काला है जो उनका नहीं हो सकता. सूर्य ने छाया से अपना यह संदेह व्यक्त भी कर दिया. इस कारण शनि के मन में अपने पिता के प्रति शत्रुवत भाव पैदा हो गए. शनि के जन्म के बाद पिता ने कभी उनके साथ पुत्रवत प्रेम प्रदर्शित नहीं किया. इस पर शनि ने भगवान शिव की कठोर तपस्या कर उन्हें प्रसन्न किया।

लंकापति रावण ने अपनी अपार शक्ति से न केवल देवताओं का राज्य छीन लिया बल्कि उसने सभी ग्रहों को भी कैद कर लिया था. जब मेघनाद का जन्म होने वाला था तब रावण ने सभी ग्रहों को उनकी उच्च राशि में स्थापित होने का आदेश दिया. उसके भय से ग्रस्त ग्रहों को भविष्य में घटने वाली घटनाओं को लेकर बड़ी चिंता सताने लगी. पर मेघनाद के जन्म के ठीक पहले शनिदेव ने अपनी राशि बदल दी. इस कारण मेघनाद अपराजेय व दीर्घायुवान नहीं हो सका। रावण ने क्रोध में आकर शनिदेव  के पैर पर गदा से प्रहार किया. इस कारण शनिदेव  की चाल में लचक आ गई।

Credit:

लेखिका: बिट्टू मिश्रा Bittu Mishra

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