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क्या आप को पता है गायत्री जयंती कब मनाते है? कब है 2026 में?

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गायत्री जयंती

दरअसल, गायत्री जयंती भारत में एक बहुत ही महत्वपूर्ण त्योहार है। चूंकि वेद हिंदू धर्म के केंद्र में हैं, और गायत्री जयंती देवी गायत्री, वेदों की मां के जन्म का जश्न मनाती है, इसलिए गायत्री जयंती का बहुत अधिक महत्व है। वास्तव में देवी गायत्री को वेदों में ब्रह्मा, विष्णु और शिव के रूप में माना गया है।उन्हें भगवान ब्रह्मा की दूसरी पत्नी भी माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को देवी ज्ञान रूप में प्रकट हुई थीं। इस दिन को निर्जला एकादशी के नाम से भी जाना जाता है।

गायत्री जयंती वह शुभ तिथि है जब वेदों की जननी मानी जाने वाली गायत्री माता का ब्रह्मांड में अवतरण हुआ था। यह सिर्फ़ किसी देवी का जन्मदिन नहीं, बल्कि मानव चेतना में आध्यात्मिक प्रकाश के प्रकट होने का दिन है।गुरु विश्वामित्र ने गायत्री मंत्र को इस पावन तिथि पर पहली बार जनमानस के लिए बोला था। तभी से ज्येष्ठ माह की एकादशी तिथि पर गायत्री जयंती मनाई जाने लगी। बहुत सारे स्थानों पर ज्येष्ठ माह में गंगा दशहरा की तिथि पर गायत्री जयंती मनाए जाने का विधान है।

गायत्री जयंती 2026 की तिथि और समय:

  • तिथि: गुरुवार, 25 जून 2026
  • एकादशी तिथि आरंभ: 24 जून 2026 को शाम 6:11 बजे
  • एकादशी तिथि समाप्त: 25 जून 2026 को शाम 8:08 बजे

पूजा-मुहूर्त पर सुझाव:

  1. यदि आप निर्जला एकादशी व्रत रखना चाहते हैं तो यह शुभ समय है।
  2. तिथि प्रारंभ के बाद, यानी 24 जून की शाम 6:11 बजे के बाद से ही ग्रह-नक्षत्र अनुकूल होने लगे, जिससे पूजा, जप और व्रत आदि आरंभ करने के लिए यह समय उत्तम माना जाता है।
  3. पूजा समाप्ति तिथि तक, यानी 25 जून शाम 8:08 बजे तक नियमित अर्चना, मंत्र जाप और व्रत-नियम पूरे किए जा सकते हैं।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार ब्रह्मा जी ने एक महायज्ञ का आयोजन किया। इस यज्ञ में पत्नी का साथ होना अनिवार्य था, परंतु उनकी पत्नी सावित्री किसी कारणवश वहाँ उपस्थित नहीं थीं। यज्ञ का शुभ मुहूर्त निकला जा रहा था और ब्रह्मा जी चिंतित थे। तब सभी देवताओं ने मिलकर एक समाधान निकाला। उन्होंने एक कन्या को प्रकट किया और ब्रह्मा जी से उनका विवाह करवा दिया, ताकि यज्ञ पूर्ण हो सके। यह कन्या और कोई नहीं, देवी गायत्री थीं। इस प्रकार, गायत्री माता ब्रह्मा जी की दूसरी पत्नी बनीं और उनके साथ मिलकर यज्ञ संपन्न हुआ।

वहीं दूसरी कथा के अनुसार, जब ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना का विचार किया, तो उन्हें मार्गदर्शन की आवश्यकता थी। उन्होंने गहन तपस्या की और तब उनके चारों मुखों से माता गायत्री प्रकट हुईं। माता गायत्री ने ब्रह्मा जी को उनकी उत्पत्ति का उद्देश्य बताया और कहा कि वे गायत्री मंत्र का जाप करें, इसी से सृष्टि की रचना होगी। ब्रह्मा जी ने गायत्री मंत्र का जाप करके ही चारों वेदों की रचना की, इसलिए माता गायत्री को “वेद माता” भी कहा जाता है।

पौराणिक कथा के अनुसार, एक कथा ऋषि विश्वामित्र से जुड़ी है। माना जाता है कि प्रारंभ में गायत्री मंत्र केवल देवताओं तक ही सीमित था। परंतु ऋषि विश्वामित्र ने कठोर तपस्या और साधना करके मां गायत्री की महिमा, यानी गायत्री मंत्र को पृथ्वी पर जनसाधारण के लिए उपलब्ध कराया। उन्होंने इस दिव्य मंत्र का प्रचार-प्रसार किया, ताकि सभी लोग इससे लाभान्वित हो सकें और अज्ञानता का नाश हो सके।

गायत्री भक्ति का ही स्वरूप है। जहां भक्ति रूपी गायत्री हैं वहां श्री नारायण का निवास होने में कोई संदेह नहीं करना चाहिए।

ऋषि विश्वामित्र कहतें हैं ,‘गायत्री से बढ़कर पवित्र करने वाला और कोई मंत्र नहीं है। जो मनुष्य नियमित रूप से तीन वर्ष तक गायत्री जाप करता है वह ईश्वर को प्राप्त करता है। जो द्विज दोनों संध्याओं में गायत्री जपता है वह वेद पढऩे के फल को प्राप्त करता है। अन्य कोई साधना करे या न करे केवल गायत्री जप से भी सिद्धि पा सकता है। नित्य एक हजार जप करने वाला पापों से वैसे ही छूट जाता है, जैसे केंचुली से सांप छूट जाता है।

महर्षि व्यास जी के अनुसार जिस तरह पुष्प का सार शहद, दूध का सार घृत है उसी प्रकार समस्त वेदों का सार गायत्री है। सिद्ध की हुई गायत्री कामधेनु के समान है। गंगा शरीर के पापों को निर्मल करती है, गायत्री रूपी ब्रह्म गंगा से आत्मा पवित्र होती है। जो गायत्री छोड़कर अन्य उपासनाएं करता है वह पकवान छोड़कर भिक्षा मांगने वाले के समान मूर्ख है।

चरक ऋषि के अनुसार जो ब्रह्मचर्य का पालन कर  गायत्री देवी की उपासना करता है और आंवले के ताजे फलों का सेवन करता है वह दीर्घजीवी होता है।

मंत्र:

ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो न: प्रचोदयात्।

अर्थ:

उस प्राणस्वरूप, दु:ख नाशक, सुख स्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देव स्वरूप परमात्मा को हम अन्तरात्मा में धारण करें। वह ईश्वर हमारी बुद्धि को सन्मार्ग पर प्रेरित करें।

देवी गायत्री की महिमा

देवी गायत्री को चार वेद, शास्त्र और श्रुतियों की जननी माना जाता है। देवी गायत्री त्रिदेवों की आराध्या हैं और समस्त देवी-देवता इनके सामने शीश झुकाते हैं। वेदों की जननी होने के कारण इनको वेद माता के नाम से भी जाना जाता है। शास्त्रों में वर्णित है कि गंगा माता की तरह देवी गायत्री भी पहले देवताओं तक ही सीमित थीं। हालांकि, कालांतर में ऋषि विश्वामित्र ने कठिन तप करके आम लोगों के लिए भी देवी गायत्री और गायत्री मंत्र को आम जनमानस के लिए भी सुलभ बना दिया। आज भी गायत्री मंत्र का जप कई लोग करते हैं।

चार वेदों में से एक अथर्ववेद में देवी गायत्री को प्राण, आयु, कीर्ति, शक्ति और धन प्रदान करने वाली देवी के रूप में वर्णित किया गया है। देवी गायत्री ब्रह्मतेज प्रदान करने वाली भी मानी जाती हैं। माना जाता है कि गायत्री मंत्र को जो व्यक्ति सिद्ध कर ले उसके लिए संसार का कोई भी कार्य मुश्किल नहीं रह जाता। गायत्री मंत्र के जप से पाप से मुक्ति भी मिलती है और आध्यात्मिक रूप से भक्तों का विकास भी होता है।

गायत्री मंत्र के जाप हो सकते हैं ये 5 फायदे

  1. यदि किसी लड़के या लड़की के विवाह में बार-बार समस्या आ रही हो तो प्रत्येक सोमवार को गायत्री मंत्र का जाप 108 बार करने से विवाह के योग बन सकते हैं।
  2. अगर किसी बच्चे का मन पढ़ाई में नहीं लगता तो उसे रोज सुबह स्नान आदि करने के बाद गायत्री मंत्र का जाप करना चाहिए, इससे स्टूडेंट्स की एकाग्रता में वृद्धि होती है।
  3. यदि किसी दंपत्ति को संतान होने में परेशानी आ रही है तो उन्हें रोज सुबह-शाम विधि-विधान से गायत्री मंत्र का जाप करना चाहिए, इससे उनकी कामना पूरी हो सकती है।
  4. अगर किसी बीमार व्यक्ति के सामने बैठकर गायत्री मंत्र का जाप विधि-विधान से किया जाए तो जल्दी ही उसकी सेहत में सुधार होने लगता है।
  5. यदि आप आर्थिक तंगी से परेशान हैं और धन लाभ की इच्छा रखते हैं तो देवी लक्ष्मी के चित्र या प्रतिमा के सामने बैठकर गायत्री मंत्र का जाप करें। इससे आपकी ये इच्छा भी जल्दी पूरी हो सकती है।

गायत्री मंत्र का जप गायत्री जयंती के साथ ही प्रत्येक दिन आप कर सकते हैं। इस मंत्र का जप करने से मानसिक शक्ति आपको प्राप्त होती है। सकारात्मक ऊर्जा और रोगों से मुक्ति के लिए भी इस मंत्र का जप किया जाता है। गायत्री मंत्र के जप से धन-धान्य और भौतिक सुखों की प्राप्ति भी व्यक्ति को होती है। वहीं गायत्री मंत्र का निरंतर जप करने वाले व्यक्ति को अंत समय में मोक्ष की प्राप्ति होती है।

अथर्ववेद के अनुसार मां गायत्री में आयु, जीवन, यश और धन की शक्ति है। उन्हें सनातन धर्म में पंचमुखी के नाम से भी जाना जाता है। इसका मतलब यह है कि ब्रह्मांड पांच तत्वों यानी पृथ्वी, प्रकाश, जल, वायु और आकाश से बना है। गायत्री माता को आप जीवन शक्ति का एक रूप मान सकते हैं जो प्रत्येक मनुष्य में विद्यमान है। इसलिए, यही कारण है कि देवी गायत्री को सभी शक्तियों का मूल माना जाता है।

गायत्री जयंती के दिन ऋषि विश्वामित्र ने सर्वप्रथम गायत्री मंत्र का उच्चारण किया था। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि वेदों की माता गायत्री इसी दिन धरती पर प्रकट हुई थीं। किंवदंतियों के अनुसार, देवी गायत्री सर्वोच्च देवी हैं और उन्हें देवी माँ के रूप में भी पूजा जाता है। देवी गायत्री ने अपने भक्तों को सभी आध्यात्मिक और सांसारिक सुख प्रदान किए।

भक्त देवी गायत्री की विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। पंडितों द्वारा आयोजित प्रार्थना और पूजा के रूप में जीवन के विभिन्न क्षेत्रों के लोग अपने सम्मान और भक्ति की पेशकश करने के लिए इकट्ठा होते हैं। इस दिन सत्संग और कीर्तन का आयोजन किया जाता है और गायत्री मंत्र का जाप किया जाता है। यदि भक्त गायत्री मंत्र का जप करते हैं, तो किसी अन्य मंत्र का जप करने की आवश्यकता नहीं होती है। दिन में तीन बार गायत्री मंत्र का जाप करना चाहिए, अधिमानतः सुबह, दोपहर और शाम को।

गायत्री मंत्र की सर्वोच्चता हिंदू धर्म शास्त्रों और पुराणों में स्थापित है। वास्तव में इस मंत्र की शक्ति सर्वविदित है वैदिक काल से ऐसा माना जाता है कि गायत्री मंत्र का जाप करने से भक्तों को जीवन के दुखों और कष्टों से मुक्ति मिलती है। वास्तव में गायत्री मंत्र व्यक्ति को सभी पापों से मुक्त कर देता है। ऐसा माना जाता है कि यह सभी दुखों को समाप्त करता है और हमारे जीवन को आनंद और खुशियों से भर देता है। गायत्री जयंती के अवसर पर भक्त गायत्री मंत्र का जाप करके इस दिन को मना सकते हैं।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माता गायत्री को पांच मुखों वाली देवी के रूप में दर्शाया जाता है। जो पृथ्वी के पांच तत्वों जैसे कि जल, वायु, पृथ्वी, अग्नि और आकाश का प्रतीक हैं। इसलिए गायत्री माता को प्रकृति की देवी और सृष्टि की आधारभूत शक्ति माना जाता है। पेड़-पौधे इन्हीं पंचमहाभूतों से मिलकर बने हैं और प्रकृति का एक अभिन्न अंग हैं। गायत्री माता को भी ‘प्राण स्वरूप’ और ‘विश्व माता’ कहा गया है, जिसका अर्थ है कि वह सभी जीवों में प्राण शक्ति के रूप में हैं। मान्यताओं के अनुसार, गायत्री माता की पूजा करने से व्यक्ति को सभी प्रकार के सुख, समृद्धि और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। अब ऐसे में इस दिन पेड़-पौधे की पूजा का विशेष महत्व है।

गायत्री जयंती ज्येष्ठ मास की शुक्ल एकादशी को मनाई जाती है। यह दिन वेदों की जननी मां गायत्री के प्राकट्य दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिन मां गायत्री की पूजा-अर्चना और गायत्री मंत्र का जाप करने का विशेष महत्व है। साथ ही इस दिन बरगद के पेड़ की पूजा का विशेष महत्व है। ऐसी मान्यता है कि बरगद के पेड़ की पूजा करने से व्यक्ति का भाग्योदय हो सकता है और सभी मनोकामनाएं पूरी हो सकती है।

Credit:

लेखिका: बिट्टू मिश्रा Bittu Mishra

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