Thursday, April 23, 2026
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वरलक्ष्मी व्रत कब है 2025 में? पूजा विधि और महत्व क्या होता है

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वरलक्ष्मी व्रत कब है 2025 में? पूजा विधि और महत्व क्या होता है
वरलक्ष्मी व्रत कब है 2025 में? पूजा विधि और महत्व क्या होता है

वरलक्ष्मी व्रत कैसे मनाया जाता है और आमतौर पर इसे कौन रखता है?
वरमहालक्ष्मी पूजा का ऐतिहासिक महत्व इत्यादि विषयों पर विस्तृत रूप से प्रकाश डाला जायेगा।

वरलक्ष्मी व्रत 2025 की तिथि और समय:

लग्नपूजा समय (लगभग)अवधि
सिंह Lagna (सुबह)06:57 AM – 09:05 AM~2 घंटा 8 मिनट
वृश्चिक Lagna (दोपहर)01:24 PM – 03:38 PM~2 घंटा 14 मिनट
कुम्भ Lagna (संध्या)07:33 PM – 09:10 PM~1 घंटा 37 मिनट
वृषभ Lagna (मध्यरात्रि)12:27 AM (9 अगस्त) – 02:27 AM~2 घंटा

पूजा का महत्व और विधि संक्षेप में

  1. वरलक्ष्मी व्रत महालक्ष्मी के वरदान पाने के लिए किया जाता है, खासकर वैवाहिक जीवन, परिवार की सुख-समृद्धि और संतान‑कल्याण हेतु
  2. दक्षिण भारत में इसे विशेष रूप से राष्ट्रव्यापी मान्यता प्राप्त है और इसे वरमहालक्ष्मी नोंबू भी कहा जाता है।
  3. पूजा विधि में साफ़‑सफाई, कलश सजा कर लक्ष्मी की मूर्ति या चिह्न स्थापित करना, अष्टलक्ष्मी की आराधना एवं कथा‑पाठ शामिल हैं।

वरलक्ष्मी व्रत एक त्योहार है ,जो तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में व्यापक रूप से लोकप्रिय है।यह श्रावण मास (जुलाई-अगस्त) शुक्ल पक्ष के अंतिम शुक्रवार को मनाया जाता है ।देवी लक्ष्मी को श्रद्धा सुमन अर्पित करने के लिए, कई विवाहित महिलाएं इस दिन उपवास रखती हैं, और अपने परिवार और पति के लिए आशीर्वाद मांगती हैं। ‘वर’ का मतलब वरदान होता है, जो लक्ष्मी अपने भक्तों को देती हैं।

भगवान विष्णु की पत्नी के रूप में, वरलक्ष्मी देवी ‘महालक्ष्मी’ का एक रूप हैं। कहा जाता है कि वह दूधिया सागर से निकली हैं, जिसे क्षीर सागर के नाम से जाना जाता है, और उन्हें दूधिया सागर जैसी दिखने वाली त्वचा के साथ चित्रित किया गया है, जो समान रंग के वस्त्र पहने हुए हैं। माना जाता है कि वरलक्ष्मी वरदान देती हैं और अपने भक्तों की सभी इच्छाएँ पूरी करती हैं, यही कारण है कि उन्हें वर + लक्ष्मी कहा जाता है, जिसका अर्थ है ‘देवी लक्ष्मी जो वरदान देती हैं’।

सनातन धर्म की मान्यता के अनुसार समस्त मानवजाति को जीवन में उत्साह,साहस,समृद्धि और खुशहाली देने वाली देवी को माता महालक्ष्मी कहा गया है। इन्हें धन, वैभव, संपत्ति, यश और कीर्ति की देवी माना जाता है। मां लक्ष्मी अपने भक्तों की अनेक रूप में मनोकामनाएं पूरी करती हैं। पुराणों में मां लक्ष्मी के 8 स्वरूपों का वर्णन है, जिन्हें अष्ट लक्ष्मी कहा जाता है। मां के ये अष्ट लक्ष्मी स्वरूप अपने नाम और रूप के अनुसार भक्तों के दुखों का नाश करते हैं, तथा सुख, समृद्धि प्रदान करते हैं।

  • 1 आदि लक्ष्मी
    इन्हें मूल लक्ष्मी,महालक्ष्मी भी कहा जाता है। श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार आदि लक्ष्मी ने सृष्टि की रचना की थी। उन्हीं से त्रिदेव और महाकाली, लक्ष्मी व महासरस्वती प्रकट हुई। इस दुनिया के पालन और संचालन के लिए उन्होंने भगवान विष्णु से विवाह किया। इनकी साधना करने से मनुष्य को जीवन में सभी सुख प्राप्त होते  हैं।
  • 2 धार्या लक्ष्मी
    मां लक्ष्मी के दूसरे स्वरूप को वीर लक्ष्मी या वरलक्ष्मी भी कहा जाता है। भौतिक और आध्यात्मिक जरूरतों को पूरा करने में आने वाली रुकावटों को वरलक्ष्मी माता दूर करती हैं। ये अकाल मृत्यु से रक्षा करतीं हैं। इन्हें मां कात्यायनी का रूप भी माना जाता है,जिन्होंने महिषासुर का वध किया था। धार्या लक्ष्मी युद्ध में विजय दिलाती है और वीरों की रक्षा करती हैं।
  • 3 संतान लक्ष्मी
    संतान लक्ष्मी को स्कंदमाता के रूप में भी जाना जाता है। इनके चार हाथ हैं तथा अपनी गोद में कुमार स्कंद को बालक रूप में लेकर विरजमान हैं। माना जाता है कि संतान लक्ष्मी भक्तों की रक्षा अपनी संतान के रूप में करती हैं। इनकी कृपा से व्यक्ति को संतान सुख की प्राप्ति होती है।
  • 4 विद्या लक्ष्मी
    मां के अष्ट लक्ष्मी स्वरूप का चौथा रूप विद्या लक्ष्मी है। ये ज्ञान, कला और कौशल प्रदान करती हैं। इनका रूप ब्रह्मचारिणी देवी के जैसा है। इनकी साधना से शिक्षा के क्षेत्र में सफलता प्राप्त होती है। विद्या लक्ष्मी व्यक्ति की क्षमता और प्रतिभा को बाहर लेकर आती है।
  • 5 धान्य लक्ष्मी
    लक्ष्मी का ये रूप प्रकृति के चमत्कारों का प्रतीक है। ये समानता सिखाती हैं क्योंकि प्रकृति सभी के लिए एक सामान है। ये संसार में धान्य यानि अन्न या अनाज के रूप में वास करती हैं। धान्य लक्ष्मी को मां अन्नपूर्णा का ही एक रूप माना जाता है। इनको प्रसन्न करने के लिए कभी भी अनाज या खाने का अनादर नहीं करना चाहिए।
  • 6 गज लक्ष्मी
    गज लक्ष्मी हाथी के ऊपर कमल के आसन पर विराजमान हैं। मां गज लक्ष्मी को कृषि और उर्वरता की देवी के रूप में पूजा जाता है। इनकी आराधना से संतान की प्राप्ति होती है। राजा को समृद्धि प्रदान करने के कारण इन्हें राज लक्ष्मी भी कहा जाता है।
  • 7 विजय लक्ष्मी
    माता लक्ष्मी के इस रूप को जय लक्ष्मी या विजय लक्ष्मी के नाम से भी जाना जाता है। मां के इस रूप की साधना से भक्तों को जीवन के हर क्षेत्र में जय-विजय की प्राप्ति होती है। जय लक्ष्मी माता यश, कीर्ति तथा सम्मान प्रदान करती हैं। विजय लक्ष्मी हर परेशानी में विजय दिलाती है और निडरता प्रदान करतीं हैं।
  • 8 धन लक्ष्मी
    जब भगवान वेंकटेश (विष्णु) ने कुबेर से कर्ज लिया तो लक्ष्मी ने कर्ज से मुक्ति दिलाने के लिए यह रूप लिया था। मां के इस रूप की पूजा कर्ज मुक्ति के लिए की जाती है। धन लक्ष्मी पैसा,सोना सम्पत्ति तो देती ही है साथ में इच्छाशक्ति, साहस, दृढ़ संकल्प व उत्साह भी प्रदान करतीं हैं।

कहा जाता है की योर के मगध में, कुंडिन्यपुरा के एक कस्बे में चारुमति नामक एक महिला रहती थी। समृद्ध नगर चारुमति और उनके पति का घर था। बड़े ही समर्पित भाव से वो आपने परिवार की सेवा करती थी। अपने परिवार के प्रति समर्पण से प्रभावित होते देखकर देवी महालक्ष्मी ने उन्हें स्वप्न में दर्शन दिया , और उनसे ‘वरलक्ष्मी’ की पूजा करने और उनकी इच्छा पूरी करने के लिए कहा। पूर्णिमा की रात से पहले श्रावण मास के अंतिम शुक्रवार को पूजा करने को कहकर माता अंतर्ध्यान हो गयीं।

जब चारुमथी ने अपने परिवार को अपना स्वप्न सुनाया , तो उन्होंने उसे पूजा करने के लिए प्रोत्साहित किया। गाँव की कई अन्य महिलाएँ पारंपरिक तरीके से पूजा करने में शामिल हुईं और देवी वरलक्ष्मी को पवित्र मंत्रों के साथ नाना प्रकार की मिठाइयाँ एवं फल पुष्प अर्पण किया। तब से लेकर आज तक महिलाएं यह पूजा और व्रत शुद्ध मन से करती आ रहीं हैं।

वरलक्ष्मी व्रत श्रावण शुक्ल पक्ष के अंतिम शुक्रवार को मनाया जाता है, जो राखी और श्रावण पूर्णिमा से कुछ दिन पहले आता है। यह व्रत पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए अनुशंसित है, हालाँकि आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और महाराष्ट्र के क्षेत्रों में, यह मुख्य रूप से विवाहित महिलाओं द्वारा मनाया जाता है। यह व्रत सांसारिक सुखों की कामना के साथ किया जाता है, जिसमें बच्चों, जीवनसाथी की भलाई और विलासिता और अन्य सांसारिक सुखों का आनंद लेना शामिल है।

वरलक्ष्मी व्रतम आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, तमिलनाडु और महाराष्ट्र में एक बहुत लोकप्रिय उपवास और पूजा दिवस है। इन राज्यों में, विवाहित महिलाएँ अपने पति और परिवार के अन्य सदस्यों की भलाई के लिए वरलक्ष्मी पूजा करती हैं। ऐसा माना जाता है कि इस दिन देवी वरलक्ष्मी की पूजा करना अष्टलक्ष्मी, धन (श्री), पृथ्वी (भू), विद्या (सरस्वती), प्रेम (प्रीति), प्रसिद्धि (कीर्ति), शांति (शांति), आनंद (तुष्टि) और शक्ति (पुष्टि) की आठ देवियों की पूजा के बराबर है।

हालाँकि, वरलक्ष्मी पूजा उत्तर भारतीय राज्यों में उतनी व्यापक रूप से नहीं मनाई जाती जितनी दक्षिण में। वरलक्ष्मी व्रतम देवी लक्ष्मी का आशीर्वाद पाने के लिए सबसे शुभ दिनों में से एक है।

विवाहित महिलाएं गुरुवार को सूर्योदय से सूर्यास्त तक व्रत रखती हैं ,और पूजा की तैयारी करती हैं। शुक्रवार को, भक्त सूर्योदय से ठीक पहले सुबह जल्दी उठकर सिर धोते हैं। घर की सफाई की जाती है और रंगोली और कलश से सजाया जाता है।

कलश को चंदन के लेप से लेपित किया जाता है और उसमें विभिन्न प्रकार की चीजें भरी जाती हैं जो हर क्षेत्र में अलग-अलग होती हैं। कलश को भरने के लिए कच्चे चावल, सिक्के, हल्दी और पत्तियों का इस्तेमाल किया जाता है और फिर एक ‘स्वास्तिक’ चिन्ह बनाया जाता है।

अंत में, कलश को आम के पत्तों से सजाया जाता है और उस पर हल्दी लगा लगाकर नारियल रखा जाता है। पूजा की शुरुआत भगवान गणेश की पूजा, श्लोकों का जाप, आरती और भगवान को मिठाई चढ़ाने से होती है। महिलाएं अपने हाथों पर पीले धागे बांधती हैं और उपहारों का आदान-प्रदान करती हैं।

उबली हुई दालें, पोंगल और गुड़ से बनी मिठाइयाँ बाँटी जाती हैं। भक्त शनिवार को अनुष्ठान पूरा करते हैं और स्नान करने के बाद कलश को हटा देते हैं। माना जाता है कि वरलक्ष्मी व्रतम का पालन करने से शांति, समृद्धि और वित्तीय आशीर्वाद प्राप्त होता है।

इस दिन ‘महालक्ष्मी अष्टकम’ का पाठ करना या श्रवण करना अत्यंत शुभकारक एवं सुखदायक मन गया है।

वरलक्ष्मी व्रत कथा:

बहुत पौराणिक समय में मगध राज्य में कुण्डी नामक एक नगर था। पुरातन काल की कथाओं के अनुसार स्वर्ग की कृपा से इस नगर का निर्माण हुआ था। यह नगर मगध राज्य के मध्य में स्थित था। इस नगर में एक ब्राह्मणी नारी चारुमति अपने परिवार के साथ रहती थी। चारुमति कर्त्यव्यनिष्ठ नारी थी जो अपने सास, ससुर एवं पति की सेवा और माँ लक्ष्मी जी की पूजा-अर्चना कर एक आदर्श नारी का जीवन व्यतीत करती थी।एक रात्रि में माँ लक्ष्मी ने चारुमति से प्रसन्न होकर उसे स्वप्न में दर्शन दिए और उसे वर लक्ष्मी नामक व्रत से अवगत कराया। इस व्रत के प्रभाव से तुम्हें मनोवांछित फल प्राप्त होगा।

अगले सुबह चारुमति ने माँ लक्ष्मी द्वारा बताये गए वर लक्ष्मी व्रत को समाज की अन्य नारियों के साथ विधिवत पूजन किया। पूजन के संपन्न होने पर सभी महिलाएं कलश की परिक्रमा करने लगीं, परिक्रमा करते समय समस्त नारियों के शरीर विभिन्न स्वर्ण आभूषणों से सज गए।

उनके घर भी स्वर्ण के बन गए तथा उनके यहां घोड़े, हाथी, गाय आदि पशु भी आ गए। सभी नारियां चारुमति की प्रशंसा करने लगें। क्योंकि चारुमति ने ही उन सबको इस व्रत विधि के विषय में बताया था।

कालांतर में यह कथा भगवान शिव जी ने माता पार्वती को सुनाई थी। इस व्रत को सुनने मात्र से लक्ष्मी जी की कृपा प्राप्त होती है।

कथा के श्रवण के उपरांत माता महालक्ष्मी की आरती करनी चाहिए।

समस्त जीवों के कल्याण की कामना के साथ

Credit:

लेखिका: बिट्टू मिश्रा Bittu Mishra

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