
संत कबीर दास जी का जन्म 1398 में ज्येष्ठ माह की पूर्णिमा को हुआ था। उनके अनुयायी प्रत्येक वर्ष मई या जून में उनकी जयंती को संत गुरु कबीर जयंती के रूप में मनाते हैं। कुछ लोग कबीरदास जयंती को कबीर प्रकट दिवस भी कहते हैं। कहा जाता हैं की उनका पालन-पोषण जुलाहा या बुनकरों के परिवार में हुआ था।
कहा जाता है कि कबीर का पालन-पोषण नीरू एवं नीमा नामक एक जुलाहा दंपति ने किया। कबीर के गुरु का नाम ‘संत स्वामी रामानंद’ था और उनका विवाह ‘लोई’ से हुआ था। कबीर दास के दो संतान हुई जिनका नाम ‘कमाल’ और ‘कमाली’ था। कबीर दास का संबंध भक्तिकाल की निर्गुण शाखा “ज्ञानमर्गी उपशाखा” से था। इनकी रचनाओं और गंभीर विचारों ने भक्तिकाल आंदोलन को गहरे स्तर तक प्रभावित किया था। इन्होनें कई रचनाएं लिखी हैं।
कबीर दास पढ़ें लिखे न होते हुए भी काव्य रचनाएं प्रस्तुत की वह अत्यन्त विस्मयकारी है ये भक्तिकाल के कवि थे। अपनी रचनाओं में इन्होंने सत्य, प्रेम, पवित्रता, सत्संग, इन्द्रिय-निग्रह, सदाचार, गुरु महिमा, ईश्वर भक्ति आदि पर अधिक बल दिया था।संत कबीर दास ने आध्यात्मिक विकास में पुनर्जागरण किया। संत कबीर दास भारत के महान संत हैं ,और उनका न केवल हिंदू बल्कि इस्लाम और सिख धर्म भी सम्मान करते हैं। कबीरदास 15वीं सदी के भारतीय रहस्यवादी कवि थे, जिनकी रचनाओं ने भक्ति आंदोलन को प्रभावित किया।
कबीर जयंती 2026 की तिथि और समय:
- तिथि: सोमवार, 29 जून 2026
- पूर्णिमा तिथि आरंभ: आरंभ: 29 जून 2026 को सुबह 3:05 बजे
- पूर्णिमा तिथि समाप्त: समाप्त: 30 जून 2026 को सुबह 5:25 बजे
पूजा-विधि सुझाव:
- पूर्णिमा तिथि आरंभ होने के बाद (29 जून, सुबह 3:05 बजे के बाद) पूजा, जप, सत्संग आदि प्रारंभ करें।
- अंत तिथि तक (30 जून, सुबह 5:25 बजे तक) सत्संग, कथा, कबीर के दोहे और भजन-संगीत में समय बिताएँ।
- सुबह-सुबह की आरती, गुरु–संतों का सम्मान और दान-पुण्य करना विशेष फलदायी है।
महत्त्व:
कबीर जयंती संत कबीर दास की जयन्ती अर्थात् प्रकट दिवस है, जिसे ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा तिथि (Jyeshtha Purnima) को मनाया जाता है। यह दिन भक्ति, एकता और सामाजिक समानता के संदेशों के स्मरण का अवसर होता है।
कबीर की भाषा में विभिन्न बोलियों के शब्द शामिल हैं, जैसे कि राजस्थानी, हरियाणवी, पंजाबी, खड़ी बोली, अवधी और ब्रजभाषा. इसलिए, इसे “पंचमेल खिचड़ी” भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है कई भाषाओं का मिश्रण। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने उनकी भाषा को “सधुक्कड़ी” कहा है, जिसका अर्थ है साधुओं द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली भाषा, जो विभिन्न स्थानों पर घूमने और विभिन्न लोगों से मिलने के कारण विभिन्न बोलियों को जानते हैं । कबीर ने अपनी भाषा में सरल और सहज शब्दों का प्रयोग किया ताकि उनकी बातें आम लोगों तक आसानी से पहुंच सकें।कबीर की भाषा में विभिन्न बोलियों के शब्द शामिल हैं, जैसे कि राजस्थानी, हरियाणवी, पंजाबी, खड़ी बोली, अवधी और ब्रजभाषा. इसलिए, इसे “पंचमेल खिचड़ी” भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है कई भाषाओं का मिश्रण। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने उनकी भाषा को “सधुक्कड़ी” कहा है, जिसका अर्थ है साधुओं द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली भाषा, जो विभिन्न स्थानों पर घूमने और विभिन्न लोगों से मिलने के कारण विभिन्न बोलियों को जानते हैं । कबीर ने अपनी भाषा में सरल और सहज शब्दों का प्रयोग किया ताकि उनकी बातें आम लोगों तक आसानी से पहुंच सकें।
संत कबीर दास ने अपने संपूर्ण जीवन में लोकहित के लिए कई उपदेश दिए व समाज में फैली कुरीतियों और आडंबरो का खुलकर विरोध किया। इसके साथ ही उन्हें हिंदी साहित्य के महान कवियों में उच्च स्थान प्राप्त हैं। जिनके अनमोल विचारों को आज भी पढ़ा और उनका अनुसरण किया जाता हैं।
15वीं शताब्दी में जब फ़ारसी और संस्कृत प्रमुख उत्तर भारतीय भाषाएँ थीं, तब उन्होंने बोलचाल की क्षेत्रीय भाषा में लिखना शुरू किया। उनकी कविता हिंदी, खड़ी बोली, पंजाबी, भोजपुरी, उर्दू, फ़ारसी और मारवाड़ी का मिश्रण है। अपने जीवन के अंतिम क्षणों में संत कबीर दास मगहर (उत्तर प्रदेश) शहर चले गये थे।
कबीरदास के कुछ प्रचलित दोहे:
गुरु गोविंद दोउ खड़े, काके लागूं पांय, बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय।
पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय, ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।
माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर, कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर।
जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान, मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान।
जग में बैरी कोई नहीं, जो मन शीतल होय, यह आपा तो डाल दे, दया करे सब कोय।
साईं इतना दीजिए, जा में कुटुंब समाय, मैं भी भूखा न रहूं, साधु ना भूखा जाय।
तन को जोगी सब करें, मन को बिरला कोई, सब सिद्धि सहजे पाइए, जे मन जोगी होइ।
माया मुई न मन मुआ, मरी मरी गया सरीर, आसा त्रिसना न मुई, यों कही गए कबीर।
बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर, पंछी को छाया नहीं फल लागे अति दूर।
जब मैं था तब हरी नहीं, अब हरी है मैं नाही, सब अँधियारा मिट गया, दीपक देखा माही
“माटी कहे कुमार से, तू क्या रोंदे मोहे । एक दिन ऐसा आएगा, मैं रोंदुंगी तोहे।”
“पाथर पूजे हरी मिले, तो मै पूजू पहाड़ ! घर की चक्की कोई न पूजे, जाको पीस खाए संसार !!”
“गुरु गोविंद दोऊ खड़े ,काके लागू पाय । बलिहारी गुरु आपने , गोविंद दियो मिलाय।।”
“यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान। शीश दियो जो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान।”
“उजला कपड़ा पहरि करि, पान सुपारी खाहिं । एकै हरि के नाव बिन, बाँधे जमपुरि जाहिं॥”
“निंदक नियेरे राखिये, आँगन कुटी छावायें । बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुहाए।”
“प्रेम न बारी उपजे, प्रेम न हाट बिकाए । राजा प्रजा जो ही रुचे, सिस दे ही ले जाए।”
“ऐसी वाणी बोलिए मन का आप खोये । औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होए।”
“जिनके नौबति बाजती, मैंगल बंधते बारि । एकै हरि के नाव बिन, गए जनम सब हारि॥”
“कबीर’ नौबत आपणी, दिन दस लेहु बजाइ । ए पुर पाटन, ए गली, बहुरि न देखै आइ॥”
“जहाँ दया तहा धर्म है, जहाँ लोभ वहां पाप । जहाँ क्रोध तहा काल है, जहाँ क्षमा वहां आप।”
अधिकांश विद्वानों का मानना है कि कबीर का निधन सन 1518 ईस्वी में हुआ था और वहीं कुछ विद्वानों का यह भी मानना है कि उन्होंने स्वेच्छा से मगहर में जाकर अपने प्राणों को त्याग दिया था। ऐसा उन्होंने इसलिए किया था ताकि लोगों के मन से अंधविश्वास को हटा सकें लोगों के बीच यह अंधविश्वास था कि मगहर में मरने पर हमें स्वर्ग की प्राप्ति नहीं होती। मानवसेवा ही संत कबीर का धर्म था। कबीर दास निर्गुण भक्ति मार्ग के अनुयायी थे। वे ईश्वर को निराकार मानते थे और मूर्ति पूजा के विरोधी थे।
कबीर किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं. उनके दोहे और पद लंबे समय से उत्तर भारतीयों की स्मृतियों में ज़िंदा रहे हैं. लेकिन फिर भी आगे बढ़ने के पहले उनके बारे में कुछ ऐतिहासिक तथ्य जान लेते हैं.
प्रोफेसर पुरुषोत्तम अग्रवाल अपनी किताब ‘कबीर: द लाइफ़ एंड वर्क्स ऑफ़ द अर्ली मॉडर्न पोएट-फ़िलॉसफ़र’ में लिखते हैं ‘माना जाता है कि कबीर का जन्म विक्रम संवत 1456 की पूर्णिमा के दिन हुआ था, जो ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार 1398 की गर्मियों में होता है और माना जाता है कि उनका निधन 1518 में हुआ था, जो उनके जन्म के एक सदी से भी ज़्यादा समय बाद हुआ था. कुछ आधुनिक विद्वानों ने उनके जन्म को पंद्रहवीं शताब्दी के मध्य में कहीं रखकर उनके जीवनकाल को ज़्यादा ‘विश्वसनीय’ बनाने की कोशिश की है।
कबीर ने अपने गुरु के तौर पर रामानंद को चुना जो वैष्णव संप्रदाय के थे, लेकिन उनके विचार किसी भी संप्रदाय या धर्म से जुड़े हुए नहीं थे. इसपर लिंडा हेस लिखती हैं ‘कुछ आधुनिक टिप्पणीकारों ने कबीर को हिंदू धर्म और इस्लाम के संश्लेषणकर्ता के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास किया है; लेकिन यह तस्वीर सही नहीं है. कबीर ने अपनी इच्छानुसार विभिन्न परंपराओं का सहारा लेते हुए, अपने देशवासियों के दोनों प्रमुख धर्मों से अपनी स्वतंत्रता की जोरदार घोषणा की व उन्होंने इन धर्मों की रूढ़ियों पर जोरदार हमला किया।
आइए अब आज के दौर को कबीर के विचारों की रोशनी में देखने का प्रयास करते हैं। आज जब सांप्रदायिकता समाज में उफान पर है, झूठी खबरों का बाज़ार गर्म है और सच बोलने वालों पर मुकदमें हो रहे हैं, तो इसपर कबीर कहते हैं:
साधो, देखो जग बौराना।
सांची कहौ तो मारन धावै झूंठे जग पतियाना।
हिंदू कहत है राम हमारा मुसलमान रहमाना।
आपस में दोउ लड़े मरतु हैं मरम कोई नहिं जाना।’
इसका अर्थ है देखो साधु, सारी दुनिया पागल हो गई है. सच्ची बात कहो तो मारने को दौड़ते हैं लेकिन झूठ पर सबका विश्वास है. हिंदू राम का नाम लेता है और मुसलमान रहमान का और दोनों आपस में इस बात पर लड़ते-मरते हैं, लेकिन सत्य को कोई नहीं समझता।
इस विषय पर इतिहासकार हरबंस मुखिया लिखते हैं, ‘उन्होंने (कबीर) दो प्रचलित रूढ़िवादिताओं पर सवाल उठाए ,प्रतिद्वंद्वी ईश्वर की अवधारणा और उनकी पूजा के लिए धार्मिक अनुष्ठानों की आवश्यकता। अल्लाह और ईश्वर के स्थान पर उन्होंने एक ही सार्वभौमिक ईश्वर की अवधारणा बनाई , संगठित धर्मों के स्थान पर उन्होंने एक सार्वभौमिक धार्मिकता की अवधारणा बनाई।
वे अपनी बात लिखते हुए कबीर के इस दोहे का हवाला देते हैं:
भाई रे दुइ जगदीश कहां ते आया, कहु कौने बौराया।
अल्लाह राम करीमा केशव, हरि हजरत नाम धराया।
इसका अर्थ है कि भाई, दो भगवान कहां से आ गए, किसने तुम्हें गुमराह करके यह विश्वास दिलाया है? अल्लाह, राम, करीम, केसव, हरि, हज़रत – ये सभी एक ही हैं।
इसी तरह आज समाज में जब अंधविश्वास फैलाते बाबाओं के प्रति एक प्रकार का आकर्षण बढ़ा है, तब हमें कबीर की ये पंक्तियाँ याद आती हैं।
मन ना रंगाये रंगाये जोगी कपड़ा।
आसन मारि मंदिर में बैठै
ब्रह्म-छांड़ि पूजन लागे पथरा।
इसका अर्थ है कि जोगी के मन में प्रेम का रंग है ही नहीं, उसने सिर्फ़ कपड़े रंगवा लिए हैं। आसन मार कर मंदिर में बैठ गया है और ब्रह्म को छोड़ कर पत्थर की पूजा कर रहा है।
यहां कबीर बाबाओं की असलियत बता रहे हैं। इसी से संबंधित उनका एक और दोहा है।
पाहन पुजे तो हरि मिले, तो मैं पूजूं पहाड़।
ताते या चाकी भली, पीस खाए संसार।।
इसका अर्थ है अगर पत्थर पूजने से भगवान मिल जाते हैं , तो हमें फिर पहाड़ को पूजना चाहिए. इससे बेहतर है कि हम चक्की को पूजे जिससे हमें रोटी मिलती है।
जैसा कि आपने देखा कबीर के दोहों और पदों में एक ओर जहां रूढ़ियों, पाखंडों व अंधविश्वासों का विरोध दिखाई देता है. वहीं दूसरी ओर उनकी ईश्वर की कल्पना और आध्यात्मता में एक प्रकार की सहजता, तार्किकता या आज की शब्दावली में कहा जाए तो लोकतांत्रिक भाव है। वे दोनों ओर की सांप्रदायिकता की मूर्खता पर बेबाकी से सीधा सवाल करते हैं ,और जातिवाद की अवैज्ञानिकता पर सीधा प्रहार। आज के परिप्रेक्ष्य में कबीर के विचारों को ज़िंदा रखने की ज़रूरत और भी बढ़ गई है।
भक्ति के संदेश
कबीर दास जी की सबसे बड़ी खासियत ये थी कि वो जिस भी भाषा में किसी किताब को लिखते थे। उसमें उस भाषा के स्थानीय शब्दों का इस्तेमाल करना नहीं भूलते थे। यही कारण है कि कबीर दास जी के दोहे आज भी देश के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग पुस्तकों की वजह से पहचाने जाते हैं।
कबीर दास जी का मानना था कि ईश्वर संसार के कण कण में समाया हुआ है। हर मन में परमेश्वर का निवास है। इसलिए ईश्वर को ढूंढने की आवश्यकता नहीं है। ईश्वर को एकाग्र मन से याद करने की आवश्यकता है।
कबीर जी का कहना था कि गुरु से बड़ा कुछ भी नहीं होता। इसीलिए अपने गुरु की तन मन धन से सेवा करना और गुरु के वचनों पर विश्वास करना एक भक्त का कर्तव्य होता है। इसके अलावा किसी भी तरह की मुसीबत आने पर आपको सिर्फ और सिर्फ अपने गुरु को याद करना चाहिए। इस दौरान आपको किसी और के बारे में ज़रा भी नहीं सोचना चाहिए।
कबीर ने कहा है कि आपको साधु गुरु की सेवा सद्भाव और प्रेम से करनी चाहिए। साथ ही गुरु गुण से संपन्न साधु को आपको अपने गुरु के समान समझना चाहिए। कबीर ने इसी तरह के कई और बहुमूल्य भक्ति से जुड़े संदेश दिए हैं।
वहीं बात करें कबीर की रचनाओं की तो कबीर दास जी ने अपने पूरे जीवनकाल में कई ऐसी रचनाएं लिखीं जिसको पढ़कर लोग आज भी मंत्रमुग्ध हो जाते हैं।
कबीर दास जी भक्ति काल के अकेले ऐसे कवि थे जिन्होंने समाज को सुधारने और लंबे समय से चली आ रही कुरीतियों पर चोट करने की कोशिश की। लोगों के बीच जागरूकता फैलाने के लिए कबीर दास जी ने कालजयी साहित्य को लिखा। इसीलिए उन्हें निर्गुण धारा के सबसे प्रमुख कवियों में से एक माना जाता है। कबीर दास के दोहे और कविताएं आज के समय में भी इतनी ज्यादा मार्मिक लगती है कि जिसने भी कबीर दास के दोहे अर्थ सहित पढ़ा उसने बार-बार उनकी किताबें का य किया।
अपनी रचनाओं के माध्यम से कबीर दास ने अंधविश्वास के साथ-साथ जात-पात और छुआछूत जैसे मुद्दों के बारे में लोगों के बीच जागरूकता फैलाने की कोशिश की। उनके द्वारा लिखे गए दोहे सीधे और कटाक्ष भरे होते हैं। कबीर दास के मशहूर दोहे आम जनमानस को धर्म और जाति से परे एक साथ जोड़ने की कोशिश की है। इन्हीं खूबियों के चलते कबीर दास को एक शानदार कवि के साथ-साथ अच्छा समाज सुधारक भी माना जाता है।
ऐसा कोई ना मिला, समुझै सैन सुजान।
ढोल बाजता ना सुनै, सुरति-बिहूना कान।।
ऐसा कोई ना मिला, हम को देइ पहिचान।
अपना करि किरपा करै, ले उतार मैदान।।
हम देखत जग जात है, जग देखत हम जाहिं।
ऐसा कोई ना मिला, पकरि छुड़ावै बाहिं।।
प्रेमी ढूँढत मैं फिरौं, प्रेमी मिले न कोय।
प्रेमी से प्रेमी मिले, विष से अमृत होय।।
सिश तो ऐसा चाहिये, गुरु को सब कुछ देय।
गुरु तो ऐसा चाहिये, सिश से कछु न लेय।।
हेरत हेरत हेरिया, रहा कबीर हिराय।
बुंद समानी समुंद में, सो कित हेरी जाय।।
हेरत हेरत हे सखी, रहा कबीर हिराय।
समुंद समाना बुंद में, सो कित हेरा जाय।।
कबीर दास का सामाजिक और धार्मिक संदेश
कबीरदास के जन्म के समय भारत की हालत बहुत खराब थी। एक तरफ मुसलमान शासकों की कट्टरता से लोग परेशान थे, और दूसरी तरफ हिंदू धर्म के पाखंड और कर्मकांड से धर्म कमजोर हो रहा था। लोगों में भक्ति की भावना नहीं थी और पंडितों के पाखंडपूर्ण बातें समाज में फैल रहे थे। ऐसे कठिन समय में कबीरदास का जन्म हुआ।
कबीरदास जिस समय आए, उससे कुछ पहले भारत में एक बड़ी घटना हुई थी—इस्लाम धर्म का आगमन। इसने भारतीय समाज और धर्म को हिला कर रख दिया था। जाति व्यवस्था को पहली बार कड़ी चुनौती मिली थी। पूरे देश में हलचल और अशांति थी। कबीर दास जी की इन्हीं बातों को ध्यान में रखकर उनके बारे में कहा जाता है कि वह जितने अच्छे कवि थे उससे कहीं अच्छे समाज सुधारक थे।
आम जीवन के साथ-साथ कबीर दास जी के दोहे ने भी जातिवाद का डटकर विरोध किया है। इतना ही नहीं उन्होंने हिंसा के साथ-साथ क्रूरता और अन्याय के खिलाफ भी आवाज उठाई है। उन्होंने सच्चाई की लाठी का सहारा लेकर समाज का कल्याण करने की कोशिश की है, जिससे लोगों के मन से छल कपट और अहंकार जैसी भावना हमेशा हमेशा के लिए गायब हो जाए। इसी वजह से कबीर दास जी के बारे में कहा जाता है कि वो अपने समय से आगे के लेखक थे।
कबीर दास हमेशा से चाहते थे कि देश और समाज का हर नागरिक अपने आप को किसी धर्म या जात-पात के झूठे खांचे में ढालने से बचे।
ऐसा करके लोगों के मन में अपने आप एकता की भावना पनपने लगेगी। कुछ ऐसा ही छुआछूत के मामले में भी है जिसके चलते किसी एक जाति या धर्म का इंसान खुद को दूसरी जाति या धर्म के इंसान से ऊंचा मानकर उसे छूने तक से कतराता है।
कबीर दास जी का कहना था कि इस तरह की चीज समाज को जोड़ने की बजाय तोड़ने का काम करती हैं। और हमें इस तरह की चीजों से बचना चाहिए।
भगत कबीर का धार्मिक संबंध किसी एक धर्म तक सीमित नहीं था।
वे ऐसे संत थे जिन्होंने हिंदू और मुस्लिम दोनों धर्मों की रूढ़ियों की आलोचना की और एक ऐसा मार्ग अपनाया जो भक्ति और सूफी परंपराओं का समन्वय था। उन्होंने ईश्वर की भक्ति को सबसे ऊपर रखा और कहा कि भगवान एक ही हैं, चाहे उन्हें राम कहा जाए या रहीम। उनके विचारों में जाति, पंथ और धार्मिक भेदभाव के खिलाफ स्पष्ट विरोध था।
इसलिए कबीर को एक ऐसे संत के रूप में जाना जाता है जो धर्मों के पार जाकर आध्यात्मिक एकता की बात करते थे।
कबीर साहब को नमन
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