Thursday, April 23, 2026
Thursday, April 23, 2026
HomeUncategorized2025 में नाग पंचमी कब है? जानें तिथि और समय

2025 में नाग पंचमी कब है? जानें तिथि और समय

- Advertisment -
2025 में नाग पंचमी कब है? जानें तिथि और समय
2025 में नाग पंचमी कब है? जानें तिथि और समय

नाग पंचमी सनातन संस्कृति का एक प्रमुख त्योहार है।हिन्दू पंचांग के अनुसार श्रावण मास की कृष्ण पक्ष के पंचमी तिथि को नाग पंचमी के रूप में मनाया जाता है। इस दिन नाग देवता या सर्प की पूजा की जाती है और उन्हें दूध से स्नान कराया जाता है।नाग पंचमी के पावन पर्व पर वाराणसी (काशी) में नाग कुआँ नामक स्थान पर बहुत बड़ा मेला लगता है

कुछ कथाओं के अनुसार इस स्थान पर तक्षक गरूड़ जी के भय से बालक रूप में काशी में संस्कृत की शिक्षा लेने आये, परन्तु गूरू पत्नी के सखियों से तक्षक रुपी बालक के बारे में बतलाने के कारण गरूड़ जी को इसकी जानकारी हो गयी,और उन्होंने तक्षक पर हमला कर दिया, परन्तु अपने गुरू जी के प्रभाव से गरूड़ जी ने तक्षक नाग को अभय दान कर दिया, उसी समय से यहाँ नाग पंचमी के दिन से नाग पूजा की जाती है,यह मान्यता है, कि जो भी नाग पंचमी के दिन यहाँ पूजा अर्चना कर नाग कुआँ का दर्शन करता है, उसकी जन्मकुन्डली के सर्प दोष का निवारण हो जाता है।

लेकिन कहीं-कहीं दूध पिलाने की परम्परा चल पड़ी है। नाग को दूध पिलाने से पाचन नहीं हो पाने या प्रत्यूर्जता से उनकी मृत्यु हो जाती है। शास्त्रों में नागों को दूध पिलाने को नहीं बल्कि दूध से स्नान कराने को कहा गया है। इस दिन नवनाग की पूजा की जाती है।

नाग पंचमी 2025 की तिथि और समय:

  • तिथि: शुक्रवार, 25 जुलाई 2025
  • पंचमी तिथि प्रारंभ: 24 जुलाई 2025 को दोपहर 02:20 बजे
  • पंचमी तिथि समाप्त: 25 जुलाई 2025 को दोपहर 12:37 बजे तक
  • पूजा का शुभ मुहूर्त: 29 जुलाई 2025, सुबह 5:41 बजे से 8:23 बजे तक (लगभग 2 घंटे 43 मिनट)

नाग पंचमी क्यों मनाई जाती है?

एक कथा के अनुसार कालिया नाग को हराने के बाद उनकी स्त्रियों ने भगवान श्री कृष्ण से उनके जीवन की भीख मांगी। गोकुल निवासियों को परेशान न करने का वादा करने के बाद, श्री कृष्ण ने उनकी जान बचाई। नाग पंचमी पर कालिया नाग पर कृष्ण की विजय का जश्न मनाया जाता है। साथ ही, सांप अपने गुप्त ज्ञान और बुद्धिमत्ता के लिए भी जाने जाते हैं। उनमें कुछ नकारात्मक लक्षण भी होते हैं, जैसे स्वामित्व, क्रोध और लालच। इसलिए, नाग पंचमी पर, लोग सांपों या नाग देवता की पूजा करते हैं ताकि वे अपने परिवार को सांप द्वारा काटे जाने से बचा सकें।

हिन्दू संस्कृति ने पशु-पक्षी, वृक्ष-वनस्पति सबके साथ आत्मीय संबंध जोड़ने का प्रयत्न किया है। हमारे यहां गाय की पूजा होती है। कई बहनें कोकिला-व्रत करती हैं। कोयल के दर्शन हो अथवा उसका स्वर कानों में जब पड़े तब ही भोजन लेना, ऐसा यह व्रत है। हमारे यहाँ वृषभोत्सव के दिन बैल का पूजन किया जाता है। वट-सावित्री जैसे व्रत में बरगद की पूजा होती है, परन्तु नाग पंचमी जैसे दिन नाग का पूजन जब हम करते हैं, तब तो हमारी संस्कृति की विशिष्टता अपने पराकाष्टा पर पहुंच जाती है।

नाग पंचमी के दिन ज्यादातर महिलाएं व्रत रखती हैं और सूर्यास्त तक कुछ भी नहीं खाती-पीती हैं। परिवार के सदस्यों को प्रसाद के रूप में खीर और दूध दिया जाता है। महिलाएं दीवारों पर सांप बनाती हैं और उन्हें दूध, मक्खन, जल और तंदुल देती हैं। फर्श पर अलग-अलग रंगों से सांप के आकार की रंगोली बनाई जाती है। ग्रामीण इलाकों में, लोग सांपों का घर की खोज करते हैं जहां उन्हें लगता है कि सांप रहते हैं। प्रार्थना के रूप में, सांपों के घरों पर धूप जलायी जाती है और साँपों को दूध पिलाया जाता है।

भारत देश कृषिप्रधान देश हैं सांप खेतों का रक्षण करता है, इसलिए उसे क्षेत्रपाल कहते हैं। जीव-जंतु, चूहे आदि जो फसल को नुकसान करने वाले तत्व हैं, उनका नाश करके सांप हमारे खेतों को हराभरा रखता है। साँप हमें कई मूक संदेश भी देता है। साँप के गुण देखने की हमारे पास गुणग्राही और शुभग्राही दृष्टि होनी चाहिए। भगवान दत्तात्रय की ऐसी शुभ दृष्टि थी, इसलिए ही उन्हें प्रत्येक वस्तु से कुछ न कुछ सीख मिली।

साँप सामान्यतया किसी को अकारण नहीं काटता। उसे परेशान करने वाले को या छेड़ने वालों को ही वह डंसता है। साँप भी प्रभु का सर्जन है, वह यदि नुकसान किए बिना सरलता से जाता हो, या निरुपद्रवी बनकर जीता हो तो उसे मारने का हमें कोई अधिकार नहीं है। जब हम उसके प्राण लेने का प्रयत्न करते हैं, तब अपने प्राण बचाने के लिए या अपना जीवन टिकाने के लिए यदि वह हमें डँस ले तो उसे दुष्ट कैसे कहा जा सकता है? हमारे प्राण लेने वालों के प्राण लेने का प्रयत्न क्या हम नहीं करते? साँप को सुगंध अत्यधिक प्रिय है। चंपा के पौधे से लिपटकर वह रहता है, या तो चंदन के वृक्ष पर वह निवास करता है। केवड़े के वन में भी वह फिरता रहता है। उसे सुगंध प्रिय लगती है, इसलिए भारतीय संस्कृति को वह प्रिय है। प्रत्येक मानव को जीवन में सद्गुणों की सुगंध आती है, सुविचारों की सुवास आती है, वह सुवास हमें प्रिय होनी चाहिए।

नाग पंचमी के दिन नागदेव का दर्शन अवश्य करना चाहिए।
बांबी (नागदेव का निवास स्थान) की पूजा करनी चाहिए।
नागदेव की सुगंधित पुष्प व चंदन से ही पूजा करनी चाहिए क्योंकि नागदेव को सुगंध बहुत प्रिय है।
ॐ कुरुकुल्ये हुं फट् स्वाहा का जाप करने से कालसर्प दोष का निवारण होता है।

एक छोटी सी कथा यह भी प्रचलित है कि प्राचीन काल में एक सेठजी के सात पुत्र थे। सातों के विवाह हो चूका था । सबसे छोटे पुत्र की पत्नी श्रेष्ठ चरित्र की विदूषी और सुशील थी, परंतु उसका कोई भाई नहीं था।एक दिन बड़ी बहू ने घर लीपने को पीली मिट्टी लाने के लिए सभी बहुओं को साथ चलने को कहा तो सभी डलिया और खुरपी लेकर मिट्टी खोदने लगी। तभी वहां एक सर्प निकला, जिसे बड़ी बहू खुरपी से मारने लगी। यह देखकर छोटी बहू ने उसे रोकते हुए कहा- ‘मत मारो इसे? यह बेचारा निरपराध है।’ यह सुनकर बड़ी बहू ने उसे नहीं मारा तब सर्प एक ओर जा बैठा। तब छोटी बहू ने उससे कहा-‘हम अभी लौट कर आती हैं तुम यहां से जाना मत। यह कहकर वह सबके साथ मिट्टी लेकर घर चली गई और वहाँ कामकाज में फँसकर सर्प से जो वादा किया था उसे भूल गई। उसे दूसरे दिन वह बात याद आई तो सब को साथ लेकर वहाँ पहुँची और सर्प को उस स्थान पर बैठा देखकर बोली- सर्प भैया नमस्कार! सर्प ने कहा- ‘तू भैया कह चुकी है, इसलिए तुझे छोड़ देता हूं, नहीं तो झूठी बात कहने के कारण तुझे अभी डस लेता। वह बोली- भैया मुझसे भूल हो गई, उसकी क्षमा माँगती हूं, तब सर्प बोला- अच्छा, तू आज से मेरी बहन हुई और मैं तेरा भाई हुआ। तुझे जो मांगना हो, माँग ले। वह बोली- भैया! मेरा कोई नहीं है, अच्छा हुआ जो तू मेरा भाई बन गया।

कुछ दिन व्यतीत होने पर वह सर्प मनुष्य का रूप रखकर उसके घर आया और बोला कि ‘मेरी बहन को भेज दो।’ सबने कहा कि ‘इसके तो कोई भाई नहीं था, तो वह बोला- मैं दूर के रिश्ते में इसका भाई हूँ, बचपन में ही बाहर चला गया था। उसके विश्वास दिलाने पर घर के लोगों ने छोटी को उसके साथ भेज दिया। उसने मार्ग में बताया कि ‘मैं वहीं सर्प हूँ, इसलिए तू डरना नहीं और जहां चलने में कठिनाई हो वहां मेरी पूछ पकड़ लेना। उसने कहे अनुसार ही किया और इस प्रकार वह उसके घर पहुंच गई। वहाँ के धन-ऐश्वर्य को देखकर वह चकित हो गई। एक दिन सर्प की माता ने उससे कहा- ‘मैं एक काम से बाहर जा रही हूँ, तू अपने भाई को ठंडा दूध पिला देना। उसे यह बात ध्यान न रही और उससे गर्म दूध पिला दिया, जिसमें उसका मुख बेतरह जल गया। यह देखकर सर्प की माता बहुत क्रोधित हुई। परंतु सर्प के समझाने पर चुप हो गई। तब सर्प ने कहा कि बहन को अब उसके घर भेज देना चाहिए। तब सर्प और उसके पिता ने उसे बहुत सा सोना, चाँदी, जवाहरात, वस्त्र-आभूषण आदि देकर उसे उसके घर पहुँचा दिया।

इतना सारा धन देखकर बड़ी बहू ने ईर्ष्या से कहा- तुम्हारा भाई तो बड़ा धनवान है, तुझे तो उससे और भी धन लाना चाहिए। सर्प ने यह वचन सुना तो सब वस्तुएँ सोने की लाकर दे दीं। यह देखकर बड़ी बहू ने कहा- ‘इन्हें झाड़ने की झाड़ू भी सोने की होनी चाहिए’। तब सर्प ने झाडू भी सोने की लाकर रख दी।

सर्प ने छोटी बहू को हीरा-मणियों का एक अद्भुत हार दिया था। उसकी प्रशंसा उस देश की रानी ने भी सुनी और वह राजा से बोली कि- सेठ की छोटी बहू का हार यहाँ आना चाहिए। राजा ने मंत्री को आदेश दिया कि उससे वह हार लेकर शीघ्र उपस्थित हो मंत्री ने सेठजी से जाकर कहा कि ‘महारानीजी छोटी बहू का हार पहनेंगी, वह उससे लेकर मुझे दे दो’। सेठजी ने डर के कारण छोटी बहू से हार मंगाकर दे दिया।

छोटी बहू को यह बात बहुत बुरी लगी, उसने अपने सर्प भाई को याद किया और आने पर प्रार्थना की- भैया ! रानी ने हार छीन लिया है, तुम कुछ ऐसा करो कि जब वह हार उसके गले में रहे, तब तक के लिए सर्प बन जाए और जब वह मुझे लौटा दे तब हीरों और मणियों का हो जाए। सर्प ने ठीक वैसा ही किया। जैसे ही रानी ने हार पहना, वैसे ही वह सर्प बन गया। यह देखकर रानी चीख पड़ी और रोने लगी।

यह देख कर राजा ने सेठ के पास खबर भेजी कि छोटी बहू को तुरंत भेजो। सेठजी डर गए कि राजा न जाने क्या करेगा? वे स्वयं छोटी बहू को साथ लेकर उपस्थित हुए। राजा ने छोटी बहू से पूछा- तुने क्या जादू किया है, मैं तुझे दण्ड दूंगा। छोटी बहू बोली- राजन ! धृष्टता क्षमा कीजिए, यह हार ही ऐसा है कि मेरे गले में हीरों और मणियों का रहता है और दूसरे के गले में सर्प बन जाता है। यह सुनकर राजा ने वह सर्प बना हार उसे देकर कहा- अभी पहनकर दिखाओ। छोटी बहू ने जैसे ही उसे पहना वैसे ही हीरों-मणियों का हो गया।

यह देखकर राजा को उसकी बात का विश्वास हो गया और उसने प्रसन्न होकर उसे बहुत सी मुद्राएं भी पुरस्कार में दीं। छोटी बहु अपने हार और राजा द्वारा दिए हुए धन सहित घर लौट आई। उसके धन को देखकर बड़ी बहू ने ईर्ष्या के कारण उसके पति को सिखाया कि छोटी बहू के पास कहीं से धन आया है। यह सुनकर उसके पति ने अपनी पत्नी को बुलाकर कहा- ठीक-ठीक बता कि यह धन तुझे कौन देता है? तब वह सर्प को याद करने लगी।

तब उसी समय सर्प ने प्रकट होकर कहा- यदि मेरी धर्म बहन के आचरण पर संदेह प्रकट करेगा तो मैं उसे खा लूँगा। यह सुनकर छोटी बहू का पति बहुत प्रसन्न हुआ और उसने सर्प देवता का बड़ा सत्कार किया। उसी दिन से नागपंचमी का त्योहार मनाया जाता है।

नाग पंचमी भारत के विभिन्न हिस्सों में मनाया जाने वाला एक जीवंत और महत्वपूर्ण त्योहार है। इस दिन सांपों की पूजा और अनुष्ठानों के माध्यम से, लोग नागों की शक्ति में अपनी श्रद्धा और विश्वास प्रदर्शित करते हैं।

हिंदू धर्म में लोग कई देवी-देवताओं का सम्मान करते हैं। नाग पंचमी पर, साँपों का सम्मान किया जाता है। नाग सभी प्रमुख हिंदू देवताओं के लिए महत्वपूर्ण हैं। भगवान विष्णु शेषनाग पर शयन करते हैं, भगवान शिव अपने गले में नाग लपेटे रहते हैं और गणेश करधनी की जगह नाग पहनते हैं। इसलिए इस दिन अन्य देवताओं की तरह नागों की भी पूजा की जाती है।

Credit:

लेखिका: बिट्टू मिश्रा Bittu Mishra

Facebook Comments Box
- Advertisment -
RELATED SONGS
- Advertisment -

Most Popular

- Advertisment -

TOP CATEGORIES