Thursday, April 23, 2026
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गुरु पूर्णिमा का क्या है महत्ता और कब मनाया जाता है?

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गुरु पूर्णिमा क्या है महत्ता और कब मनाया जाता है?
गुरु पूर्णिमा क्या है महत्ता और कब मनाया जाता है?

गुरु पूर्णिमा सनातन धर्म की संस्कृति है।सनातन संस्कृति में आषाढ़ मास की पूर्णिमा तिथि को गुरु पूर्णिमा कहा जाता है। इसलिए आषाढ़ शुक्ल पक्ष पूर्णिमा को ‘ गुरु पूर्णिमा ‘ मनाया जाता है।

हमारे ग्रंथों में गुरु में ‘ गु ‘ का अर्थ अन्धकार या अज्ञान और ‘रू ‘ का अर्थ प्रकाश (अन्धकार को दूर भगाने वाला ) । अर्थात् अज्ञान को हटा कर प्रकाश की ओर ले जाने वाले मार्गदर्शक को गुरु कहा जाता है।

कहा गया है ,गुरु कृपा से ही ईश्वर का साक्षात्कार होता है।

गुरु पूर्णिमा क्या है महत्ता और कब मनाया जाता है?

गुरु पूर्णिमा 2025 की तिथि और समय:

  • तिथि: गुरुवार, 10 जुलाई 2025
  • पूर्णिमा तिथि आरंभ: 10 जुलाई 2025, रात 1:36 बजे
  • पूर्णिमा तिथि समाप्त: 11 जुलाई 2025, रात 2:06 बजे

शुभ मुहूर्त (पूजा के लिए उपयुक्त समय)

  1. ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 4:10 – 4:50 बजे
  2. अभिजीत मुहूर्त: सुबह 11:59 – 12:54 बजे
  3. विजय मुहूर्त: दोपहर 12:45 – 3:40 बजे
  4. गोधूली मुहूर्त: शाम 7:21 – 7:41 बजे

पूजा विधि (संक्षेप में)

  1. प्रातः स्नान के बाद साफ वस्त्र धारण करें और पूजा स्थल तैयार करें।
  2. गुरुओं, भगवान विष्णु–लक्ष्मी तथा महर्षि वेद व्यास देव की पूजा अर्चना करें।
  3. मंत्र जाप और गुरु-देव की वंदना करें।
  4. अगर संभव हो तो रात में चंद्रमा दर्शन करके अर्घ्य दें।

आदिगुरु परमेश्वर शिव दक्षिणामूर्ति रूप में समस्त ऋषि मुनियों को शिष्य के रूप में शिवज्ञान प्रदान किया था। उन्हीं का स्मरण करते हुए ‘गुरुपूर्णिमा’ मानाया जाता है। गुरु पूर्णिमा उन सभी आध्यात्मिक गुरुजनों को समर्पित परम्परा है , जिन्होंने बिना किसी लोभ और लालच के अपने ज्ञान रूपी प्रकाश से समस्त संसार को प्रकाशमान कर दिया।

‘गुरुपूर्णिमा’ भारत, नेपाल और भूटान में हिन्दू, जैन और बौद्ध धर्म के अनुयायी उत्सव के रूप में मनाते हैं।इस पर्व को हिन्दू, बौद्ध और जैन धर्म के अनुयायी अपने आध्यात्मिक शिक्षकों / अधिनायकों के सम्मान और उन्हें अपनी कृतज्ञता दिखाने के रूप में मनातें हैं। यह पर्व हिन्दू पंचांग के हिन्दू माह आषाढ़ की पूर्णिमा (जून-जुलाई) मनाया जाता है।

इस उत्सव को महात्मा गांधी ने अपने आध्यात्मिक गुरु श्रीमद राजचन्द्र जी को सम्मान देने के लिए पुनर्जीवित किया। ‘गुरुपूर्णिमा’ महर्षि वेदव्यास जी के जन्मदिवस के रूप में भी मनाया जाता है।

इस दिन गुरु पूजा का विधान है। गुरु पूर्णिमा वर्षा ऋतु के आरम्भ में आती है। इस दिन से चार महीने तक  साधु-सन्त एक ही स्थान पर रहकर ज्ञान की गंगा बहाते हैं। ये चार महीने मौसम की दृष्टि से भी सर्वश्रेष्ठ होते हैं। न अधिक गर्मी और न अधिक सर्दी। इसलिए अध्ययन के लिए  इस समय  को उपयुक्त माना गया है। जैसे सूर्य के ताप से तप्त भूमि को वर्षा से शीतलता एवं फसल पैदा करने की शक्ति मिलती है, वैसे ही गुरु-चरणों में उपस्थित साधकों को ज्ञान, शान्ति, भक्ति और योग शक्ति प्राप्त करने की शक्ति मिलती है। 

“अज्ञान तिमिरांधस्य ज्ञानांजन शलाकया, चकच्छू: मिलिटम येन तस्मै श्री गुरुवै नमः “

गुरु तथा देवता में समानता के लिए एक श्लोक में कहा गया है कि जैसी भक्ति की आवश्यकता देवता के लिए है वैसी ही गुरु के लिए भी।

गुरु पूर्णिमा का मुख्य महत्व गुरु का सम्मान और आभार व्यक्त करना है। यह दिन अपने गुरु को याद करने और उनके ज्ञान और मार्गदर्शन के लिए धन्यवाद देने का एक महत्वपूर्ण अवसर है। यह दिन महर्षि वेदव्यास जी के जन्मदिन के रूप में भी मनाया जाता है, जिन्हें हिंदू धर्म में पहला गुरु माना जाता है।

गुरु पूर्णिमा का महत्व कुछ इस प्रकार है।
गुरु का सम्मान :-
गुरु पूर्णिमा गुरु को श्रद्धाभाव के साथ सम्मान देने का एक महत्वपूर्ण अवसर है। इस दिन लोग अपने गुरु की पूजा करते हैं, उन्हें गुरु दक्षिणा देते हैं, और उनसे आशीर्वाद लेते हैं।

ज्ञान की प्राप्ति:

गुरु पूर्णिमा ज्ञान और शिक्षा के महत्व को उजागर करती है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि गुरु के ज्ञान और मार्गदर्शन से ही हम अपने जीवन में आगे बढ़ सकते हैं। सद्गुरु की कृपा से ईश्वर का साक्षात्कार भी संभव है। गुरु की कृपा के अभाव में कुछ भी संभव नहीं है।

आध्यात्मिक उन्नति:

गुरु पूर्णिमा आध्यात्मिक उन्नति का भी प्रतीक है। इस दिन लोग अपने गुरु से प्रेरणा लेते हैं और आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ते हैं।

सिख धर्म में महत्व:

सिख धर्म में गुरु पूर्णिमा का विशेष महत्व है, क्योंकि इस दिन सिख धर्म के दस गुरुओं को याद किया जाता है और उनका सम्मान किया जाता है ।

बौद्ध धर्म में महत्व:

बौद्ध धर्म में भी गुरु पूर्णिमा का महत्व है, क्योंकि इस दिन गौतम बुद्ध को याद किया जाता है, जिन्होंने अपना पहला उपदेश दिया था।

गुरु की हमारे जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका होती है। गुरु के बताए मार्ग पर चलकर हम ईश्वर तक पहुंच सकते हैं। शास्त्रों में गुरु को ईश्वर से भी ऊंचा दर्जा प्राप्त है, क्योंकि गुरु के ज्ञान और मार्गदर्शन से ही जीवन का अंधकार दूर होता है। इसलिए हर किसी के जीवन में गुरु का होना बहुत महत्वपूर्ण है।

गुरु बिन ज्ञान न उपजै, गुरु बिन मिलै न मोष।
गुरु बिन लखै न सत्य को, गुरु बिन मैटैं न दोष।।

कहने का भाव है कि बिना गुरु के ज्ञान का मिलना असंभव है। मनुष्य तब तक अज्ञान रुपी अंधकार मे भटकता हुआ मायारूपी सांसारिक बन्धनो मे जकडा रहता है ,जब तक कि गुरु कि कृपा नहीं प्राप्त होती।
मोक्ष रुपी मार्ग दिखलाने वाले गुरु हैं। बिना गुरु के सत्य एवं असत्य का ज्ञान नहीं होता। उचित और अनुचित के भेद का ज्ञान नहीं होता फिर मोक्ष कैसे प्राप्त होगा ? इसलिए गुरु कि शरण में जाने से ही जीवन को सही दिशा मिल पाएगी|

कहा जाता है कि आषाढ़ पूर्णिमा को आदि गुरु वेद व्यास का जन्म हुआ था। उनके सम्मान में ही आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। मगर गूढ़ अर्थों को देखना चाहिए क्योंकि आषाढ़ मास में आने वाली पूर्णिमा तो पता भी नहीं चलती है। आकाश में बादल घिरे हो सकते हैं , और बहुत संभव है कि चंद्रमा के दर्शन तक न हो पाए।
बिना चंद्रमा के कैसी पूर्णिमा! कभी कल्पना की जा सकती है? चंद्रमा की चंचल किरणों के बिना तो पूर्णिमा का अर्थ ही भला क्या रहेगा. अगर किसी पूर्णिमा का जिक्र होता है तो वह शरद पूर्णिमा का होता है तो फिर शरद की पूर्णिमा को क्यों न श्रेष्ठ माना जाए क्योंकि उस दिन चंद्रमा की पूर्णता मन मोह लेती है। मगर महत्व तो आषाढ़ पूर्णिमा का ही अधिक है क्योंकि इसका विशेष महत्व है।

आषाढ़ की पूर्णिमा ही क्यों है गुरु पूर्णिमा

आषाढ़ की पूर्णिमा को चुनने के पीछे गहरा अर्थ है कि गुरु तो पूर्णिमा के चंद्रमा की तरह हैं जो पूर्ण प्रकाशमान हैं और शिष्य आषाढ़ के बादलों की तरह। आषाढ़ में चंद्रमा बादलों से घिरा रहता है जैसे बादल रूपी शिष्यों से गुरु घिरे हों। शिष्य सब तरह के हो सकते हैं, वे अंधेरे बादल की तरह ही हैं. उसमें भी गुरु चांद की तरह चमक सके, उस अंधेरे से घिरे वातावरण में भी प्रकाश जगा सके, तो ही गुरु पद की श्रेष्ठता है। इसलिए आषाढ़ की पूर्णिमा का महत्व है! इसमें गुरु की तरफ भी इशारा है और शिष्य की तरफ भी। यह इशारा तो है ही कि दोनों का मिलन जहाँ हो, वहीं कोई सार्थकता है।

गुरु पुर्णिमा पर्व का महत्व

  1. जीवन में गुरु और शिक्षक के महत्व को आने वाली पीढ़ी को बताने के लिए यह पर्व आदर्श है। व्यास पूर्णिमा या गुरु पूर्णिमा अंधविश्वास के आधार पर नहीं बल्कि श्रद्धाभाव से मनाना चाहिए।
  2. गुरु का आशीर्वाद सबके लिए कल्याणकारी व ज्ञानवर्द्धक होता है, इसलिए इस दिन गुरु पूजन के उपरांत गुरु का आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए।

गुरु पूर्णिमा की पूजा विधि

हिन्‍दू धर्म में गुरु को भगवान से ऊपर दर्जा दिया गया है. गुरु के जरिए ही ईश्‍वर तक पहुंचा जा सकता है. ऐसे में गुरु की पूजा भी भगवान की तरह ही होनी चाहिए. गुरु पूर्णिमा के दिन सुबह-सवेरे उठकर स्‍नान करने के बाद स्‍वच्‍छ वस्‍त्र धारण करें. फिर घर के मंदिर में किसी चौकी पर सफेद कपड़ा बिछाकर उस पर 12-12 रेखाएं बनाकर व्यास-पीठ बनाएं। इसके बाद इस मंत्र का उच्‍चारण करें- ‘गुरुपरंपरासिद्धयर्थं व्यासपूजां करिष्ये’.

पूजा के बाद अपने गुरु या उनके फोटो की पूजा करें. अगर गुरु सामने ही हैं तो सबसे पहले उनके चरण धोएं। उन्‍हें तिलक लगाएं और फूल अर्पण करें. उन्‍हें भोजन कराएं. इसके बाद दक्षिण देकर पैर छूकर विदा करे।

गुरु पूर्णिमा के दिन चंद्रमा व अन्य ग्रह एक खास तरह से सीध में आ जाते हैं, जिससे लोग उस आयाम के प्रति ग्रहणशील बनते हैं, जिसे हम गुरु के नाम से जानते हैं।

पारंपरिक तौर पर अपने यहां लोगों ने ग्रहणशीलता के इस समय का जितना सर्वश्रेष्ठ सदुपयोग हो सकता था, उतना लाभ लेने की कोशिश की। आमतौर पर भारत में इस दिन लोग चांदनी रात में घर से बाहर रहते थे और अगर संभव हुआ तो अपने गुरु के साथ समय बिताते थे। लोग पूरी रात या तो ध्यान में बिताते थे या फिर नाचते-गाते व पूरी जोश में भजन कीर्तन में डूबे रहतें हैं ।

इन्हीं दिनों आदियोगी की नजर अपने पहले सात शिष्यों पर पड़ी, जिन्हें हम आज सप्तर्षि के नाम से जानते हैं। यौगिक संस्कृति में शिव को ईश्वर की तरह नहीं पूजा जाता, बल्कि उन्हें आदियोगी यानी पहला योगी माना जाता है और उन्हें आदि गुरु भी कहा गया है, वह पहले गुरु हैं , जिनसे यौगिक विज्ञान की शुरुआत हुई।

तो हम लोग ऐसे महीने में है, जहां अपने आसपास के परिवेश के प्रति पूरी तरह से तटस्थ हुए योगी और तपस्वी ने भी इन चीजों से जुड़ना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे अपने अनुभवों को साझा करने की इच्छा इस महीने में पैदा होने लगी थी।

उन सप्तर्षियों ने पूरे 84 साल तक आदियोगी का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किए बिना लगातार कुछ साधारण तैयारी से जुड़े अभ्यास किए थे। उसके बाद सूर्य की एक संक्रांति के दौरान, जब सूर्य उत्तर से दक्षिण की ओर जाता है – जिसे भारतीय संस्कृति में दक्षिणायन के नाम से जाना जाता है – आदियोगी ने गौर किया कि ये सातों ऋषि अपने आप में एक चमकते हुए प्राणी बन चुके हैं। उसके बाद 28 दिनों तक आदियोगी उन सप्तर्षियों पर से अपना ध्यान नहीं हटा पाए। ऋषियों पर आदियोगी का ध्यान एकटक लगा था।

फिर सूर्य की ग्रीष्मकालीन संक्रांति  के बाद पहली पूर्णिमा आने पर आदियोगी ने उन्हें दीक्षित करने का निर्णय लिया। उन्होंने निर्णय किया कि वे उनके गुरु बनेंगे। इसलिए इस पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है। इस महीने को ऐसे महीने के रूप में देखा जाता है, जहां एक पूरी तरह से कठोर ह्रदय  तपस्वी भी अपने आसपास को अनदेखा नहीं कर सका और उसका दिल उन सात लोगों के प्रति करुणा से भर उठा। ऐसे कोई योगी जिन्होंने अपने आपको इतना कठोर बना लिया हो कि दुनिया उनको छू भी न सके, वे भी इस मौके पर आकर पिघल उठे और करुणा से भर कर गुरु बनने के लिए बाध्य हो गए।

इसलिए इस महीने को गुरु की कृपा और आशीर्वाद पाने का सर्वश्रेष्ठ समय माना जाता है, ताकि आप आध्यात्मिक प्रक्रिया के प्रति पूरी तरह से ग्रहणशील बन सकें। यह उस कृपा का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने का सबसे अच्छा समय है।

गुरुर्ब्रह्मा, गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वर:।

गुरुर्साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नम:।।

अर्थात गुरु ब्रह्मा, विष्णु और महेश है। गुरु तो परम ब्रह्म के समान होता है, ऐसे गुरु को मेरा प्रणाम।

मनुस्मृति के अनुसार उपनयन संस्कार के बाद विद्यार्थी का दूसरा जन्म होता है। इसीलिए उसे द्विज कहा जाता है। शिक्षा पूर्ण होने तक गायत्री उसकी माता तथा आचार्य उसका पिता होता है। पूर्ण शिक्षा के बाद वह गुरुपद प्राप्त कर लेता है।

गुरु पूर्णिमा से संबंधित पौराणिक कथा के अनुसार, महर्षि वेदव्यास भगवान विष्णु के अंश स्वरूप कलावतार हैं। उनके पिता का नाम ऋषि पराशर तथा माता का नाम सत्यवती था। उन्हें बाल्यकाल से ही अध्यात्म में अधिक रुचि थी।

अत: उन्होंने अपने माता-पिता से प्रभु दर्शन की इच्छा प्रकट की और वन में जाकर तपस्या करने की आज्ञा मांगी, लेकिन माता सत्यवती ने वेदव्यास की इच्छा को ठुकरा दिया। तब वेदव्यास के हठ पर माता ने वन जाने की आज्ञा दे दी और कहा कि जब घर का स्मरण आए तो लौट आना। इसके बाद वेदव्यास तपस्या हेतु वन चले गए और वन में जाकर उन्होंने कठिन तपस्या की।

इस तपस्या के पुण्य-प्रताप से वेदव्यास को संस्कृत भाषा में प्रवीणता हासिल हुई। तत्पश्चात उन्होंने चारों वेदों का विस्तार किया और महाभारत, अठारह महापुराणों सहित ब्रह्मसूत्र की रचना की। वेदव्यास को हम कृष्णद्वैपायन के नाम से भी जानते है। अत: हिन्दू धर्म में वेदव्यास को भगवान के रूप में पूजा जाता है। इस दिन वेदव्यास का जन्म होने के कारण इसे व्यास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। महर्षि वेदव्यास को अमरता का वरदान प्राप्त है। अतः आज भी महर्षि वेदव्यास किसी न किसी रूप में हमारे बीच उपस्थित हैं।

प्राचीनकाल से ही भारत में गुरु और शिष्य की परंपरा रही है। भगवान शिव के बाद गुरुदेव दत्त यानी दत्तात्रेय को सबसे बड़ा गुरु माना गया है। इसके बाद देवताओं के पहले गुरु अंगिरा ऋषि थे। उसके बाद अंगिरा के पुत्र बृहस्पति गुरु बने। उसके बाद बृहस्पति के पुत्र भारद्वाज गुरु बने थे। इसके अलावा हर देवता किसी न किसी का गुरु रहा है। सभी असुरों के गुरु का नाम शुक्राचार्य हैं। शुक्राचार्य से पूर्व महर्षि भृगु असुरों के गुरु थे। कई महान असुर हुए हैं जो किसी न किसी के गुरु रहे हैं।

महाभारत काल में गुरु द्रोणाचार्य एकलव्य, कौरव और पांडवों के गुरु थे। परशुराम जी कर्ण के गुरु थे। इसी तरह किसी ना किसी योद्धा का कोई ना कोई गुरु होता था। वेद व्यास, गर्ग मुनि, सांदीपनि, दुर्वासा आदि। चाणक्य के गुरु उनके पिता चणक थे। महान सम्राट चंद्रगुप्त के गुरु आचार्य चाणक्य थे। चाणक्य के काल में कई महान गुरु हुए हैं।

ऐसा कहा जाता है कि महावतार बाबा ने आदिशंकराचार्य को क्रिया योग की शिक्षा दी थी और बाद में उन्होंने संत कबीर को भी दीक्षा दी थी। इसके बाद प्रसिद्ध संत लाहिड़ी महाशय को उनका शिष्य बताया जाता है। नवनाथों के महान गुरु गोरखनाथ के गुरु मत्स्येन्द्रनाथ (मछंदरनाथ) थे, जिन्हें 84 सिद्धों का गुरु माना जाता है।

गुरु के अभाव में हमारा जीवन शून्य होता है। गुरु अपने शिष्यों से कोई स्वार्थ नहीं रखते हैं, उनका उद्देश्य सभी का कल्याण ही होता है। गुरु को उस दिन अपने कार्यो पर गर्व होता है, जिस दिन उसका शिष्य एक बड़े पद पर पहुंच जाता है। एक व्यक्ति गुरु का ऋण सभी नहीं चुका पाता है। गुरु और शिक्षकों का सम्मान करना हमारा कर्तव्य है। एक विद्यार्थी के जीवन में गुरु अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। गुरु के ज्ञान और संस्कार के आधार पर ही उसका शिष्य ज्ञानी बनता है। गुरु मंद बुद्धि के शिष्य को भी एक योग्य व्यक्ति बना देते हैं। संस्कार और शिक्षा जीवन का मूल स्वभाव होता है। इनसे वंचित रहने वाला व्यक्ति मुर्ख है। गुरु के ज्ञान का कोई तोल नहीं होता है।

Credit:

लेखिका: बिट्टू मिश्रा Bittu Mishra

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