
गजेन्द्र मोक्ष की कथा श्रीमद्भागवत महापुराण की सबसे प्रेरणादायक कथाओं में से एक है। यह कथा बताती है कि जब मनुष्य अपने अहंकार और सांसारिक शक्तियों को छोड़कर पूर्ण श्रद्धा से भगवान की शरण में जाता है, तब ईश्वर स्वयं उसकी रक्षा करते हैं।
गजेन्द्र कौन थे?
गजेन्द्र कोई साधारण हाथी नहीं थे। अपने पूर्व जन्म में वे इन्द्रद्युम्न नामक राजा थे, जो भगवान विष्णु के महान भक्त थे। एक ऋषि के शाप के कारण उन्हें हाथी योनि प्राप्त हुई, लेकिन उनके भीतर की भक्ति समाप्त नहीं हुई।
झील में हुआ भयंकर संघर्ष
एक दिन गजेन्द्र अपने झुंड के साथ एक सुंदर सरोवर में स्नान करने गए। तभी एक मगरमच्छ ने उनका पैर पकड़ लिया। दोनों के बीच लंबा संघर्ष चला। धीरे-धीरे गजेन्द्र की शक्ति क्षीण होने लगी, जबकि मगरमच्छ पानी में होने के कारण अधिक शक्तिशाली होता गया।

पूर्ण समर्पण का क्षण
जब गजेन्द्र ने देखा कि उनकी सारी शक्ति व्यर्थ हो रही है, तब उन्होंने भगवान विष्णु का स्मरण किया। उन्होंने अपनी सूँड में कमल लेकर भगवान को अर्पित किया और करुणामय प्रार्थना की। यह प्रार्थना ‘गजेन्द्र स्तुति’ के नाम से प्रसिद्ध है।
भगवान विष्णु का आगमन
अपने भक्त की पुकार सुनकर भगवान विष्णु तुरंत गरुड़ पर सवार होकर वहाँ पहुँचे। उन्होंने सुदर्शन चक्र से मगरमच्छ का बंधन काट दिया और गजेन्द्र को मुक्त कर दिया। गजेन्द्र को मोक्ष प्राप्त हुआ और मगरमच्छ भी अपने शाप से मुक्त हो गया।
गजेन्द्र मोक्ष का आध्यात्मिक महत्व
गजेन्द्र जीवात्मा का प्रतीक हैं और मगरमच्छ संसार के मोह, दुख और बंधनों का। यह कथा सिखाती है कि केवल ईश्वर की शरण और सच्ची भक्ति ही जीवन के बंधनों से मुक्ति दिला सकती है।
निष्कर्ष
गजेन्द्र मोक्ष की कथा श्रद्धा, समर्पण और ईश्वर की कृपा का अद्भुत उदाहरण है। यह हमें याद दिलाती है कि कठिन से कठिन परिस्थिति में भी यदि हम ईश्वर पर विश्वास रखें, तो उनकी कृपा अवश्य प्राप्त होती है।

