
हिंदू पंचांग में समय-समय पर एक विशेष महीना आता है जिसे अधिक मास कहा जाता है। यह केवल कैलेंडर को संतुलित करने के लिए जोड़ा गया एक अतिरिक्त महीना नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक अत्यंत भावुक और दिव्य कथा छिपी हुई है। यही कारण है कि अधिक मास को आज पुरुषोत्तम मास के नाम से भी जाना जाता है।
यह कथा बताती है कि कैसे एक उपेक्षित और तिरस्कृत महीने को स्वयं भगवान विष्णु ने अपना नाम और आशीर्वाद दिया।
वह महीना जिसे कोई स्वीकार नहीं करता था
प्राचीन काल में हिंदू पंचांग चंद्रमा और सूर्य की गति के अनुसार चलता था। चंद्र वर्ष, सौर वर्ष से छोटा होता है, इसलिए समय का संतुलन बनाए रखने के लिए कुछ वर्षों बाद एक अतिरिक्त महीना जोड़ना पड़ता था। यही अतिरिक्त महीना था — अधिक मास।
लेकिन समस्या यह थी कि इस महीने का कोई विशेष महत्व नहीं माना जाता था।
अन्य महीनों की तरह इसमें बड़े त्योहार नहीं आते थे, न ही इसका कोई अधिष्ठाता देवता था। लोग इसे अशुभ मानने लगे और इसे मल मास कहकर पुकारने लगे, जिसका अर्थ था — “अशुद्ध” या “त्यागा हुआ महीना।”
धीरे-धीरे अधिक मास दुखी और अपमानित हो गया।
अधिक मास पहुँचा भगवान विष्णु के पास
अपमान और तिरस्कार से व्यथित होकर अधिक मास सभी देवताओं के पास सहायता मांगने गया, लेकिन किसी ने उसे स्वीकार नहीं किया।
अंततः वह भगवान विष्णु के धाम पहुँचा।
अधिक मास ने करुण स्वर में कहा:
“हे प्रभु, सभी महीनों का सम्मान होता है, लेकिन मुझे अपवित्र और अशुभ कहा जाता है। कोई मुझे अपना नहीं मानता। कृपया मेरा उद्धार कीजिए।”
भगवान विष्णु ने उसकी पीड़ा सुनी और दया से भर गए।
भगवान विष्णु ने दिया अपना नाम
भगवान विष्णु बोले:
“आज से तुम मल मास नहीं कहलाओगे। मैं तुम्हें अपना नाम देता हूँ। अब तुम पुरुषोत्तम मास कहलाओगे। जो भी इस महीने में सच्चे मन से भक्ति करेगा, उसे विशेष पुण्य और मेरा आशीर्वाद प्राप्त होगा।”
“पुरुषोत्तम” भगवान विष्णु का एक पवित्र नाम है, जिसका अर्थ है — सर्वश्रेष्ठ पुरुष या परमात्मा।
उस दिन से अधिक मास अत्यंत पवित्र माना जाने लगा। जो महीना कभी तिरस्कृत था, वही भगवान विष्णु का प्रिय महीना बन गया।
अधिक मास में शुभ कार्य क्यों नहीं किए जाते?
आज भी बहुत से लोग अधिक मास में विवाह, गृह प्रवेश या नए कार्य शुरू करने से बचते हैं। इसका कारण यह नहीं कि यह महीना अशुभ है।
दरअसल, शास्त्रों के अनुसार यह समय सांसारिक कार्यों से अधिक आध्यात्मिक साधना के लिए माना गया है।
- व्रत रखते हैं
- भगवान विष्णु और कृष्ण की पूजा करते हैं
- दान-पुण्य करते हैं
- भगवद गीता और पुराणों का पाठ करते हैं
- भजन, कीर्तन और सत्संग करते हैं
यह महीना आत्मचिंतन और भक्ति का समय माना जाता है।
अधिक मास का आध्यात्मिक महत्व
मान्यता है कि अधिक मास में किए गए जप, तप, दान और पूजा का फल कई गुना अधिक मिलता है। इस महीने में सच्चे मन से की गई भक्ति मनुष्य के पापों को कम करती है और जीवन में शांति तथा सकारात्मकता लाती है।
इसलिए लाखों भक्त इस महीने को भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त करने का अवसर मानते हैं।
इस कथा का गहरा संदेश
अधिक मास की कहानी केवल एक पौराणिक कथा नहीं है, बल्कि यह जीवन का एक गहरा सत्य भी सिखाती है। जिसे संसार ने ठुकरा दिया, भगवान ने उसी को सबसे अधिक सम्मान दिया।
यह कथा हमें सिखाती है कि ईश्वर की कृपा से तिरस्कार भी सम्मान में बदल सकता है। कोई भी व्यक्ति या वस्तु वास्तव में तुच्छ नहीं होती, यदि उस पर भगवान की कृपा हो।
निष्कर्ष
अधिक मास केवल हिंदू कैलेंडर का एक अतिरिक्त महीना नहीं है। यह भक्ति, धैर्य, विनम्रता और ईश्वर की कृपा का प्रतीक है।
भगवान विष्णु ने जिस महीने को अपना नाम देकर पवित्र बनाया, वही आज पुरुषोत्तम मास के रूप में करोड़ों भक्तों के लिए श्रद्धा और साधना का समय बन चुका है।
शायद यही अधिक मास का सबसे बड़ा संदेश है —
जिसे दुनिया भूल जाए, उसे भी भगवान अपना सकते हैं।

